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sahitak Dhaaraaa, ਅਦਬ ਤੇ ਫ਼ਲਸਫ਼ੇ ਦੀ ਧਾਰਾ...
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Friday, 17 February 2012
कहानी लाश -कमलेश्वर
कहानी
लाश
कमलेश्वर
सारा शहर सजा हुआ था। खास-खास सड़कों पर जगह-जगह फाटक बनाए गए थे। बिजली
के खम्बों पर झंडे, दीवारों पर पोस्टर। वालंटियर कई दिनों से शहर में परचे
बाँट रहे थे। मोर्चे की गतिविधियाँ तेज़ी पकड़ती जा रही थीं। ख़्याल तो
यहाँ तक था कि शायद रेलें, बसें और हवाई यातायात भी ठप्प हो जाएगा। शहर-भर
में भारी हड़ताल होगी और लाखों की संख्या में लोग जुलूस में भाग लेंगे।कमलेश्वर
शहर से बाहर एक मैदान में पूरा नगर ही बस गया था।
दूर-दूर से टुकडियाँ आ रही थीं। कुछ टुकडियाँ ठेके की बसों में आई थीं।
बसों पर भी झंडे थे। कपड़े की पट्टियों पर तहसील का नाम था। कुछ टुकड़ियों
में औरतें भी थीं, बच्चे भी। औरतें खाली वक्त में अभियान गीत गाती रहतीं।
केंद्रीय समिति ने कुछ नए नारे बनाए थे। ज़िला स्तर के कुछ लोग उन नारों का रियाज़ कर रहे थे। लंगर में आपाधापी थी। शहर के सब रास्ते, होटल, धर्मशालाएँ, सराएँ और मामूली रिश्तेदारों के घर प्रदर्शनकारियों से भरे हुए थे।
दो महीने पहले दर्जियों को झंडे और टोपी सिलने का ठेका दे दिया गया था। परचे और पोस्टरों का काम सात छापेख़ानों के पास था जिन परचों पर माँगें और नारे छपे थे, वे सब प्रदर्शनकारियों को बाँट दिए गए थे। पुलिस की सरगर्मी भी बढती जा रही थी। यातायात पुलिस ने नागरिकों की सुविधा के लिए ऐलान निकालने शुरू कर दिए- कि मोर्चे वाले दिन नागरिक शहर की किन-किन सडकों को इस्तेमाल न करें... कि नागरिक अपनी गाडियाँ इत्यादि सुरक्षित स्थानों पर रखें।
मोर्चे की विशालता का अंदाज़ लगाकर पुलिस कमिश्नर ने पी.ए.सी. को बुला लिया था। जिन-जिन सड़कों से जुलूस को गुज़रना था, उनकी इमारतों पर जगह-जगह सशस्त्र पुलिस तैनात कर दी थी। सड़कों के दोनों ओर सिर्फ वह पुलिस थी, जिसके पास डंडे थे... ताकि प्रदर्शनकारियों को ताव न आए। यह सब इंतज़ाम पुलिस कमिश्नर ने खुद ही कर लिया था।
अपने चौकस इंतज़ाम की खबर देने के लिए जब पुलिस कमिश्नर मुख्यमंत्री के पास पहुँचा तो उसका सारा तनाव खुद ही खत्म हो गया। मुख्यमंत्री के चेहरे पर कोई चिंता या परेशानी नहीं थी। वे हमेशा की तरह प्रसन्न मुद्रा में थे। गृहमंत्री धीरे-धीरे मुस्करा रहे थे। मुख्यमंत्री ने कुछ कहा तो पुलिस कमिश्नर ने तफ़सील देनी शुरू की- दो हजार लोकल फोर्स हैं, पाँच सौ पी.एस.सी., चार सौ डिस्ट्रिक्ट से आया है, तीन सौ रेलवे का है, अस्सी जवान जेल से उठा लिए हैं, दो सौ होमगार्ड! इनमें से आठ सौ आर्म्ड हैं। हर पुलिस चौकी पर शैल्स का इंतजाम है। सोलह सौ लाठियाँ पिछले हफ़्ते आ गई थीं। साढ़े चार सौ का फोर्स सिविलियन है।
पुलिस कमिश्नर सब बताता जा रहा था, पर मुख्यमंत्री विशेष उत्सुकता से नहीं सुन रहे थे। गृहमंत्री भी बहुत दिलचस्पी नहीं ले रहे थे। कमिश्नर कुछ हैरान हुआ। उसने एक क्षण रुक कर उन दोनों की तरफ ताका, तो मुख्यमंत्री ने अपना चश्मा साफ करते हुए कहा, 'ख़्वामख़्वाह आपने इतनी तवालत की।
'इन विरोधी पार्टियों का कुछ भरोसा नहीं... अगर हम इंतज़ाम न करें तो...' कमिश्नर कह रहा था।
'मोर्चा शांत रहेगा।' गृहमंत्री ने कहा।
'क्या पता। कमिश्नर बोला, 'मुझे तो...'
मुख्यमंत्री ने बात काट दी- 'बहुत ऊधम नहीं मचेगा। बस जरा गुंडों पर नजर रखिएगा...'
'गुण्डे तो तीन-चौथाई से ज्यादा पकड़ लिए गए हैं... यह तो तीन दिन पहले ही कर लिया गया था। कुछ आज दोपहर बंद कर दिए जाएँगे।'
'ठीक है।'
'तो मैं इजाज़त लूँ?' कमिश्नर ने पूछा।
'ठीक है', मुख्यमंत्री ने कहा, 'अक्ल से काम लीजिएगा। मेरे ख्याल से आप मोर्चे के
कर्ताधर्ताओं से मिलते हुए निकल जाइए। तीनों यहीं एम.एल.ए. हॉस्टल में टिके हुए हैं...
'जी मुझे मालूम है, पर शायद अब तक वे अपने पण्डाल में चले गए होंगे...।' कमिश्नर ने जरा सकुचाते हुए कहा, 'और वहाँ जाकर मिलना... मेरे ख़्याल से ठीक नहीं होगा...'
'वह यहीं होंगे... अरे भई, आपको मालूम नहीं, उनमें से कांति तो मेरे साथ जेल में रहे हैं। बड़े आदर्शवादी आदमी हैं... तेज और बेलाग। ऐसे विरोधी को तो मैं सर-माथे बिठाता हूँ। उनकी बस एक ही कमजोरी है- नींद! आप उनके सर पर नगाड़ा बजाइए, पर वे नहीं उठ सकते। जेल में भी यही आदत थी। सत्याग्रह आंदोलन के दिनों में भी! उन्हें नींद पूरी चाहिए... अभी वहीं होंगे...' मुख्यमंत्री ने तारीफ़ करते हुए आगे कहा, 'अब मोर्चे का मामला है, इसलिए शायद वे मिलने न आएं, नहीं तो हमेशा आते हैं... बेहद उम्दा आदमी है। भई, मैं तो उनकी बड़ी इज़्ज़त करता हूँ।'
'इस पार्टीबाजी और पॉलिटिक्स को क्या कहा जाए... कांतिलाल जी को तो सरकार में होना चाहिए था...' गृहमंत्री ने बड़े दुःख से कहा।
'बिलकुल... मुख्यमंत्री बोले, 'देखते जाइए, मिल जाए तो ठीक है... मेरा नमस्कार बोलिएगा। न हों तो पण्डाल जाने की जरूरत नहीं है...'
पुलिस कमिश्नर नया था। बहुत सकुचाते हुए बोला, 'मोर्चेवाले शायद आपका पुतला भी जलाएँगे, उसके बारे में...'
'अरे ठीक है, जलाने दीजिए... इससे आपका क़ानून कहाँ भंग होता है। जो उनके दिल में आए करने दीजिए, आप निगरानी रखिए, बस, आपकी यही जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री ने कहा और कुर्सी से उठ खड़े हुए।
चार बजे चौक मैदान से जुलूस चल पड़ा। मोर्चा जबरदस्त था। सबसे आगे झंडे और बिगुल थे। उनके पीछे अभियान गीत गाने वालों की टोली थी। उसके पीछे माँगों की तख्तियां पकड़े औरतों की टोली थी। उसके पीछे हज़ारों की संख्या में प्रदर्शनकारी थे। जगह-जगह से आए हुए लोग सब टोपियाँ लगाए थे। हाथों में छोटे-छोटे झंडे या माँगों की तख़्ती पकड़े थे। मोर्चा बहुत शान से चल रहा था। कतारों के दोनों तरफ कंधों से लाउडस्पीकर लटकाए नारे देने वाले वालंटियर थे। बीचों बीच झंडों से सजी जीप पर कांतिलाल, उनके साथी नेता और कुछेक महत्वपूर्ण लोग थे।
मोर्चा बढता जा रहा था। हर कोई चकित था। पता नहीं, इतने लोग एकाएक कहाँ से निकल पड़े थे। तमाशबीन नागरिकों की कतारें झंडेवाली पुलिस के पीछे से आश्चर्य से झाँक रही थीं।
सचमुच विश्वास नहीं होता था कि इतनी तादाद में लोग अभी जीवित होंगे कि वे अब भी इन तरीक़ों पर भरोसा करते होंगे। शानदार और उमड़ता हुआ अपार जुलूस अदम्य शक्ति से बढ़ता जा रहा था। बड़े अख़बारों के फोटोग्राफर इमारतों पर चढ-चढकर हर मोड़ पर जुलूस के चित्र खींच रहे थे। कुछेक विदेशी फोटोग्राफर इस ऐतिहासिक मोर्चे को देखकर हैरान थे। वे जनतंत्र की ताकत के बारे में एकाध फ़िक़रा बोलकर अपने काम में मशग़ूल हो जाते थे। वे ज्यादातर आदिवासियों वाली टोली के चित्र उतार रहे थे। सरकारी फिल्म्स डिवीजन के कैमरामैन अपना काम कर रहे थे।
लम्बी सड़क पर जाते हुए जुलूस का दृश्य अदृश्य था। लाखों पैर-ही-पैर... लाखों सिर-ही-सिर। हज़ारों झंडे और उत्साह से भरे नारे...हहराता हुआ जनसमूह और समवेत गर्जन। कहीं न ओर न छोर। मीलों तक अजगर की तरह तभी एकाएक विध्वंस हो गया... जुलूस के अगले हिस्से में भगदड़ मच गई। सारा बाराबाँट हो गया। चारों तरफ बदहवासी भर गई। इमारतों की खिडकियों और दुकानों के दरवाजे तड-तड होने लगे। जुलूस दौड़ती-भागती चीखती-चिल्लाती बदहवास और अंधी भीड़ में दबल गया। चारों ओर भयंकर बदअमनी फैल गई। फिर धुएँ के बादल उठे... कुछ लपटें दिखाई दीं। तोड़फोड़ की गूँजती हुई आवाज़ें और घबराहट भरी चीखें आईं और गोलियाँ चलने की चटखती हुई तड़तड़ाहट से वातावरण व्याप्त हो गया। धुएँ के समुद्र में जैसे लाखों लोग ऊब-चूब रहे हों। गिरते-पड़ते और भागते हुए लोग। कुचले और अंगभंग हुए लोग... हुंकारे, चीखें, धमाके, शोर और तड़तड़ाहट।
देखते-देखते सब कुछ हो गया। सड़कों पर सिर्फ जूते-चप्पलें, झण्डे और माँगों की तख़्तियां रह गईं। फटे कपड़े, टोपियाँ, टूटे डंडे और फटी हुई पताकाएँ।
कुछ पता नहीं चला कि यह विध्वंस कैसे हुआ। क्यों हुआ? पुलिस की गाडियों में दंगाई और घायल भरे गए। घायलों को अस्पताल में पहुँचा दिया गया। दंगाइयों को दस मील ले जाकर छोड़ दिया गया। वे गुण्डे नहीं थे, गुण्डे पहले से बंद थे।
चोटें बहुतों को आई थीं। वे आपस में कुचल गए थे। पुलिस ने गोली चलाई जरूर थी, पर हवाई फ़ायर किए थे। उसकी गोली से एक भी आदमी घायल नहीं हुआ था। अंगों की सिर्फ टूट-फूट हुई थी।
सारा शहर सन्न रह गया था। ग़नीमत थी कि इतने बडे हादसे में सिर्फ एक लाश गिरी थी। वह लाश भी बिल्कुल सालिम थी। उसके न गोली लगी थी, न वह कहीं से घायल थी।
पुलिस ने लाश के चारों ओर से डेरा डाल लिया थ। पुलिस का कहना था कि लाश कांतिलाल की है। कांतिलाल ने यह सुना तो हैरान रह गए। भगदड़ और उस भयंकर हादसे से प्रकृतिस्थ होकर कुछ देर बाद वे लाश को देखने पहुँचे। उसे देखते ही कांतिलाल ने जोश से भरे स्वर में कहा - 'यह मुख्यमंत्री की लाश है।'
घटित हुए हादसे का मुआयना करने के लिए मुख्यमंत्री भी निकल चुके थे। उन्होंने यह सुना तो सकपकाए हुए पहुँचे। उन्होंने गौर से लाश को देखा और मुस्कराते हुए बोले- 'यह मेरी नहीं है।'
केंद्रीय समिति ने कुछ नए नारे बनाए थे। ज़िला स्तर के कुछ लोग उन नारों का रियाज़ कर रहे थे। लंगर में आपाधापी थी। शहर के सब रास्ते, होटल, धर्मशालाएँ, सराएँ और मामूली रिश्तेदारों के घर प्रदर्शनकारियों से भरे हुए थे।
दो महीने पहले दर्जियों को झंडे और टोपी सिलने का ठेका दे दिया गया था। परचे और पोस्टरों का काम सात छापेख़ानों के पास था जिन परचों पर माँगें और नारे छपे थे, वे सब प्रदर्शनकारियों को बाँट दिए गए थे। पुलिस की सरगर्मी भी बढती जा रही थी। यातायात पुलिस ने नागरिकों की सुविधा के लिए ऐलान निकालने शुरू कर दिए- कि मोर्चे वाले दिन नागरिक शहर की किन-किन सडकों को इस्तेमाल न करें... कि नागरिक अपनी गाडियाँ इत्यादि सुरक्षित स्थानों पर रखें।
मोर्चे की विशालता का अंदाज़ लगाकर पुलिस कमिश्नर ने पी.ए.सी. को बुला लिया था। जिन-जिन सड़कों से जुलूस को गुज़रना था, उनकी इमारतों पर जगह-जगह सशस्त्र पुलिस तैनात कर दी थी। सड़कों के दोनों ओर सिर्फ वह पुलिस थी, जिसके पास डंडे थे... ताकि प्रदर्शनकारियों को ताव न आए। यह सब इंतज़ाम पुलिस कमिश्नर ने खुद ही कर लिया था।
अपने चौकस इंतज़ाम की खबर देने के लिए जब पुलिस कमिश्नर मुख्यमंत्री के पास पहुँचा तो उसका सारा तनाव खुद ही खत्म हो गया। मुख्यमंत्री के चेहरे पर कोई चिंता या परेशानी नहीं थी। वे हमेशा की तरह प्रसन्न मुद्रा में थे। गृहमंत्री धीरे-धीरे मुस्करा रहे थे। मुख्यमंत्री ने कुछ कहा तो पुलिस कमिश्नर ने तफ़सील देनी शुरू की- दो हजार लोकल फोर्स हैं, पाँच सौ पी.एस.सी., चार सौ डिस्ट्रिक्ट से आया है, तीन सौ रेलवे का है, अस्सी जवान जेल से उठा लिए हैं, दो सौ होमगार्ड! इनमें से आठ सौ आर्म्ड हैं। हर पुलिस चौकी पर शैल्स का इंतजाम है। सोलह सौ लाठियाँ पिछले हफ़्ते आ गई थीं। साढ़े चार सौ का फोर्स सिविलियन है।
पुलिस कमिश्नर सब बताता जा रहा था, पर मुख्यमंत्री विशेष उत्सुकता से नहीं सुन रहे थे। गृहमंत्री भी बहुत दिलचस्पी नहीं ले रहे थे। कमिश्नर कुछ हैरान हुआ। उसने एक क्षण रुक कर उन दोनों की तरफ ताका, तो मुख्यमंत्री ने अपना चश्मा साफ करते हुए कहा, 'ख़्वामख़्वाह आपने इतनी तवालत की।
'इन विरोधी पार्टियों का कुछ भरोसा नहीं... अगर हम इंतज़ाम न करें तो...' कमिश्नर कह रहा था।
'मोर्चा शांत रहेगा।' गृहमंत्री ने कहा।
'क्या पता। कमिश्नर बोला, 'मुझे तो...'
मुख्यमंत्री ने बात काट दी- 'बहुत ऊधम नहीं मचेगा। बस जरा गुंडों पर नजर रखिएगा...'
'गुण्डे तो तीन-चौथाई से ज्यादा पकड़ लिए गए हैं... यह तो तीन दिन पहले ही कर लिया गया था। कुछ आज दोपहर बंद कर दिए जाएँगे।'
'ठीक है।'
'तो मैं इजाज़त लूँ?' कमिश्नर ने पूछा।
'ठीक है', मुख्यमंत्री ने कहा, 'अक्ल से काम लीजिएगा। मेरे ख्याल से आप मोर्चे के
कर्ताधर्ताओं से मिलते हुए निकल जाइए। तीनों यहीं एम.एल.ए. हॉस्टल में टिके हुए हैं...
'जी मुझे मालूम है, पर शायद अब तक वे अपने पण्डाल में चले गए होंगे...।' कमिश्नर ने जरा सकुचाते हुए कहा, 'और वहाँ जाकर मिलना... मेरे ख़्याल से ठीक नहीं होगा...'
'वह यहीं होंगे... अरे भई, आपको मालूम नहीं, उनमें से कांति तो मेरे साथ जेल में रहे हैं। बड़े आदर्शवादी आदमी हैं... तेज और बेलाग। ऐसे विरोधी को तो मैं सर-माथे बिठाता हूँ। उनकी बस एक ही कमजोरी है- नींद! आप उनके सर पर नगाड़ा बजाइए, पर वे नहीं उठ सकते। जेल में भी यही आदत थी। सत्याग्रह आंदोलन के दिनों में भी! उन्हें नींद पूरी चाहिए... अभी वहीं होंगे...' मुख्यमंत्री ने तारीफ़ करते हुए आगे कहा, 'अब मोर्चे का मामला है, इसलिए शायद वे मिलने न आएं, नहीं तो हमेशा आते हैं... बेहद उम्दा आदमी है। भई, मैं तो उनकी बड़ी इज़्ज़त करता हूँ।'
'इस पार्टीबाजी और पॉलिटिक्स को क्या कहा जाए... कांतिलाल जी को तो सरकार में होना चाहिए था...' गृहमंत्री ने बड़े दुःख से कहा।
'बिलकुल... मुख्यमंत्री बोले, 'देखते जाइए, मिल जाए तो ठीक है... मेरा नमस्कार बोलिएगा। न हों तो पण्डाल जाने की जरूरत नहीं है...'
पुलिस कमिश्नर नया था। बहुत सकुचाते हुए बोला, 'मोर्चेवाले शायद आपका पुतला भी जलाएँगे, उसके बारे में...'
'अरे ठीक है, जलाने दीजिए... इससे आपका क़ानून कहाँ भंग होता है। जो उनके दिल में आए करने दीजिए, आप निगरानी रखिए, बस, आपकी यही जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री ने कहा और कुर्सी से उठ खड़े हुए।
चार बजे चौक मैदान से जुलूस चल पड़ा। मोर्चा जबरदस्त था। सबसे आगे झंडे और बिगुल थे। उनके पीछे अभियान गीत गाने वालों की टोली थी। उसके पीछे माँगों की तख्तियां पकड़े औरतों की टोली थी। उसके पीछे हज़ारों की संख्या में प्रदर्शनकारी थे। जगह-जगह से आए हुए लोग सब टोपियाँ लगाए थे। हाथों में छोटे-छोटे झंडे या माँगों की तख़्ती पकड़े थे। मोर्चा बहुत शान से चल रहा था। कतारों के दोनों तरफ कंधों से लाउडस्पीकर लटकाए नारे देने वाले वालंटियर थे। बीचों बीच झंडों से सजी जीप पर कांतिलाल, उनके साथी नेता और कुछेक महत्वपूर्ण लोग थे।
मोर्चा बढता जा रहा था। हर कोई चकित था। पता नहीं, इतने लोग एकाएक कहाँ से निकल पड़े थे। तमाशबीन नागरिकों की कतारें झंडेवाली पुलिस के पीछे से आश्चर्य से झाँक रही थीं।
सचमुच विश्वास नहीं होता था कि इतनी तादाद में लोग अभी जीवित होंगे कि वे अब भी इन तरीक़ों पर भरोसा करते होंगे। शानदार और उमड़ता हुआ अपार जुलूस अदम्य शक्ति से बढ़ता जा रहा था। बड़े अख़बारों के फोटोग्राफर इमारतों पर चढ-चढकर हर मोड़ पर जुलूस के चित्र खींच रहे थे। कुछेक विदेशी फोटोग्राफर इस ऐतिहासिक मोर्चे को देखकर हैरान थे। वे जनतंत्र की ताकत के बारे में एकाध फ़िक़रा बोलकर अपने काम में मशग़ूल हो जाते थे। वे ज्यादातर आदिवासियों वाली टोली के चित्र उतार रहे थे। सरकारी फिल्म्स डिवीजन के कैमरामैन अपना काम कर रहे थे।
लम्बी सड़क पर जाते हुए जुलूस का दृश्य अदृश्य था। लाखों पैर-ही-पैर... लाखों सिर-ही-सिर। हज़ारों झंडे और उत्साह से भरे नारे...हहराता हुआ जनसमूह और समवेत गर्जन। कहीं न ओर न छोर। मीलों तक अजगर की तरह तभी एकाएक विध्वंस हो गया... जुलूस के अगले हिस्से में भगदड़ मच गई। सारा बाराबाँट हो गया। चारों तरफ बदहवासी भर गई। इमारतों की खिडकियों और दुकानों के दरवाजे तड-तड होने लगे। जुलूस दौड़ती-भागती चीखती-चिल्लाती बदहवास और अंधी भीड़ में दबल गया। चारों ओर भयंकर बदअमनी फैल गई। फिर धुएँ के बादल उठे... कुछ लपटें दिखाई दीं। तोड़फोड़ की गूँजती हुई आवाज़ें और घबराहट भरी चीखें आईं और गोलियाँ चलने की चटखती हुई तड़तड़ाहट से वातावरण व्याप्त हो गया। धुएँ के समुद्र में जैसे लाखों लोग ऊब-चूब रहे हों। गिरते-पड़ते और भागते हुए लोग। कुचले और अंगभंग हुए लोग... हुंकारे, चीखें, धमाके, शोर और तड़तड़ाहट।
देखते-देखते सब कुछ हो गया। सड़कों पर सिर्फ जूते-चप्पलें, झण्डे और माँगों की तख़्तियां रह गईं। फटे कपड़े, टोपियाँ, टूटे डंडे और फटी हुई पताकाएँ।
कुछ पता नहीं चला कि यह विध्वंस कैसे हुआ। क्यों हुआ? पुलिस की गाडियों में दंगाई और घायल भरे गए। घायलों को अस्पताल में पहुँचा दिया गया। दंगाइयों को दस मील ले जाकर छोड़ दिया गया। वे गुण्डे नहीं थे, गुण्डे पहले से बंद थे।
चोटें बहुतों को आई थीं। वे आपस में कुचल गए थे। पुलिस ने गोली चलाई जरूर थी, पर हवाई फ़ायर किए थे। उसकी गोली से एक भी आदमी घायल नहीं हुआ था। अंगों की सिर्फ टूट-फूट हुई थी।
सारा शहर सन्न रह गया था। ग़नीमत थी कि इतने बडे हादसे में सिर्फ एक लाश गिरी थी। वह लाश भी बिल्कुल सालिम थी। उसके न गोली लगी थी, न वह कहीं से घायल थी।
पुलिस ने लाश के चारों ओर से डेरा डाल लिया थ। पुलिस का कहना था कि लाश कांतिलाल की है। कांतिलाल ने यह सुना तो हैरान रह गए। भगदड़ और उस भयंकर हादसे से प्रकृतिस्थ होकर कुछ देर बाद वे लाश को देखने पहुँचे। उसे देखते ही कांतिलाल ने जोश से भरे स्वर में कहा - 'यह मुख्यमंत्री की लाश है।'
घटित हुए हादसे का मुआयना करने के लिए मुख्यमंत्री भी निकल चुके थे। उन्होंने यह सुना तो सकपकाए हुए पहुँचे। उन्होंने गौर से लाश को देखा और मुस्कराते हुए बोले- 'यह मेरी नहीं है।'
Saturday, 14 January 2012
ਬੁਲੰਦ ਅਵਾਜ਼ ਗਾਇਕ ਸਨ ਮਹਿੰਦਰ ਕਪੂਰ

-ਮੁਹੰਮਦ ਰਫ਼ੀ, ਮੁਕੇਸ਼ ਤੇ ਮੰਨਾ ਡੇਅ, ਇਨ੍ਹਾਂ ਤਿੰਨਾਂ ਮਹਾਰਥੀਆਂ ਦੇ ਸਮਿਆਂ ਵਿਚ ਇਕ ਖਿੱਚ ਪਾਉਂਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਸੀ ਜਿਸ ਦਾ ਨਾਂ ਸੀ ਮਹਿੰਦਰ ਕਪੂਰ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਤਕਰੀਬਨ ਪੰਜ ਦਹਾਕੇ ਦੇ ਕੈਰੀਅਰ ਵਿਚ ਰੁਮਾਂਟਕ ਤੇ ਦੇਸ਼ ਭਗਤੀ ਤੇ ਹੋਰ ਕਈ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੇ ਗਾਣਿਆਂ ਨੂੰ ਅਵਾਜ਼ ਦਿਤੀ। ਫਿਲਮ ਨੁਕਤਾਚੀਨ ਅਸ਼ੋਕ ਪੰਡਤ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਮਹਿੰਦਰ ਕਪੂਰ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਵਿਚ ਲੋਕ-ਰੰਗ ਸੀ। ਏਸੇ ਕਾਰਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਲੋਂ ਗਾਏ ਦੇਸ਼ ਭਗਤੀ ਦੇ ਗਾਣੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਦਿਲਾਂ ਦੇ ਲਾਗੇ ਸਨ। ਮਹਿੰਦਰ ਕਪੂਰ ਕੋਲ ਵੱਖਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਖਿੱਚ ਸੀ। ਕਪੂਰ ਵਲੋਂ ਗਾਇਆ ਗੀਤ ਮੇਰੇ ਦੇਸ਼ ਕੀ ਧਰਤੀ... ਸੁਣਨ 'ਤੇ ਏਦਾਂ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਜਿਵੇਂ ਠੇਠ ਪੰਜਾਬੀ ਅੰਦਾਜ਼ ਨਾਲ ਹਿੰਦੀ ਬੋਲੀ ਵਿਚ ਗਾਣਾ ਗਾਇਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇ। ਓਸ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਵਿਚ ਉਹ ਗੱਲ ਸੀ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਪਿੰਡਾਂ, ਖੇਤਾਂ ਤੇ ਢਾਬਿਆਂ ਤਾਈਂ ਲੈ ਜਾਂਦੀ ਸੀ ਤੇ ਇਹੀ ਕਾਰਨ ਹੈ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਲੋਂ ਗਾਏ ਮੁਲਕਪ੍ਰਸਤੀ ਗੀਤ ਬਹੁਤ ਹਰਮਨ-ਪਿਆਰੇ ਹੋਏ। ਮਨੋਜ ਕੁਮਾਰ ਦੀ ਫਿਲਮ ਉਪਕਾਰ ਦਾ ਗਾਣਾ ਮੇਰੇ ਦੇਸ਼ ਕੀ ਧਰਤੀ, ਪੂਰਬ ਔਰ ਪਸ਼ਚਿਮ ਦਾ ਗਾਣਾ ਭਾਰਤ ਕਾ ਰਹਿਨੇ ਵਾਲਾ ਹੂੰ ਆਦਿ ਮਹਿੰਦਰ ਕਪੂਰ ਵਾਸਤੇ ਲਿਖੇ ਹੀ ਜਾਪਦੇ ਹਨ। ਦਿ ਵਾਈਬ੍ਰੈਂਟ ਵਾਇਸ ਆਫ ਇੰਡੀਆ ਦੇ ਲਕਬ ਨਾਲ ਮਸ਼ਹੂਰ ਮਹਿੰਦਰ ਕਪੂਰ ਪਹਿਲੇ ਭਾਰਤੀ ਪਲੇਅਬੈਕ ਸਿੰਗਰ ਸਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਵਿਚ ਗੀਤ ਰਿਕਾਰਡ ਕਰਾਇਆ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਓ ਸੇਲੀ ਪਲੀਜ਼ ਹੈਲਪ ਮੀ ਤੇ ਆਈ ਐਮ ਫੀਲਿੰਗ ਬਲੂ ... ਗਾ ਕੇ ਨਿਭਾਏ। ਫਿਲਮ ਨੁਕਤਾਚੀਨ ਰਾਮ ਕਿਸ਼ੋਰ ਪਾਰਚਾ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ, ''ਹਰੇਕ ਗਵੱਈਏ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਵਿਚਲੀ ਆਪਣੀ ਖ਼ਾਸੀਅਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਜਿਹੜੀ ਉਸ ਨੂੰ ਦੂਜਿਆਂ ਤੋਂ ਅੱਡ ਸਥਾਪਤ ਕਰਦੀ ਹੈ। ਇਹ ਵੱਖਰੀ ਅਦਾ ਮਹਿੰਦਰ ਕਪੂਰ ਕਪੂਰ ਕੋਲ ਸੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਰੂਮਾਨੀ ਤੇ ਮੁਲਕਪ੍ਰਸਤੀ ਦੇ ਗੀਤਾਂ ਵਿਚ ਇਕ ਅਲੱਗ ਕਸ਼ਿਸ਼ ਪੈਦਾ ਕੀਤੀ ਪਰ ਨਾਲ ਹੀ ਗ਼ਜ਼ਲਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਓਨੀਂ ਹੀ ਸ਼ਿੱਦਤ ਨਾਲ ਗਾਇਆ ਜਿਹੜੇ ਵਾਹਵਾ ਹਰਮਨ ਪਿਆਰੇ ਹੋਏ। ਨੁਕਤਾਚੀਨ ਪਾਰਚਾ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਹਰੇਕ ਅਵਾਜ਼ ਦੀ ਆਪਣੀ ਖ਼ਾਸੀਅਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਜੋ ਕਿਸੇ ਕਿਰਦਾਰ, ਗਾਣੇ ਜਾਂ ਫਿਲਮ ਲਈ ਬਿਲਕੁਲ ਮਾਫਕ ਤੇ ਢੁਕਵੀਂ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਇਹ ਕਹਿਣਾ ਗਲਤ ਹੈ ਕਿ ਗਾਇਕ ਕਰ ਕੇ ਕਿਸੇ ਕਲਾਕਾਰ ਨੂੰ ਫਾਇਦਾ ਜਾਂ ਨੁਕਸਾਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਸਬੰਧ ਵਿਚ ਨੁਕਤਾਚੀਨ ਅਸ਼ੋਕ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਹਰੇਕ ਕਲਾਕਾਰ ਦੀ ਆਪਣੀ ਖ਼ਾਸੀਅਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਦੋ ਗਾਇਕਾਂ ਜਾਂ ਕਲਾਕਾਰਾਂ ਦੀ ਤੁਲਨਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕਦੀ। ਮਹਿੰਦਰ ਕਪੂਰ ਦੇ ਗੀਤ ਮੁਹੰਮਦ ਰਫ਼ੀ ਗਾਉਂਦੇ ਤਾਂ ਆਪਣੇ ਅੰਦਾਜ਼ ਨਾਲ ਗਾਉਂਦੇ। ਹਮੇਸ਼ਾ ਚੇਤਿਆਂ 'ਚ ਰਹਿਣਗੇ ਮਹਿੰਦਰ ਕਪੂਰ ਦਾ ਜਨਮ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵਿਚ ਨੌ ਜਨਵਰੀ 1934 ਨੂੰ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਪੰਜ ਦਹਾਕਿਆਂ ਦੇ ਆਪਣੇ ਕੈਰੀਅਰ ਵਿਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵੱਖ ਵੱਖ ਭਾਸ਼ਾਵਾਂ ਵਿਚ ਤਕਰੀਬਨ 25000 ਗੀਤਾਂ ਨੂੰ ਅਵਾਜ਼ ਦਿੱਤੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਹਿੰਦੀ ਬੋਲੀ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਪੰਜਾਬੀ, ਗੁਜਰਾਤੀ ਤੇ ਮਰਾਠੀ ਬੋਲੀ ਵਿਚ ਗੀਤ ਗਾਏ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਦਮਸ੍ਰੀ ਨਾਲ ਵੀ ਨਵਾਜ਼ਿਆ ਗਿਆ। ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਵਿਚ ਉਹ ਮੁਹੰਮਦ ਰਫ਼ੀ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਵਤ ਸਨ ਪਰ ਛੇਤੀ ਹੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਪੰਡਤ ਜਗਨ ਨਾਥ ਬਾਸੂ, ਉਸਤਾਦ ਨਿਆਜ਼ ਅਹਿਮਦ ਖਾਨ, ਉਸਤਾਦ ਅਬਦੁਲ ਰਹਿਮਾਨ ਖਾਨ ਤੇ ਪੰਡਤ ਤੁਲਸੀ ਦਾਸ ਸ਼ਰਮਾ ਜਿਹੇ ਸ਼ਾਸਤਰੀ ਸੰਗੀਤ ਦੇ ਉਸਤਾਦਾਂ ਤੋਂ ਸ਼ਾਸਤਰੀ ਸੰਗੀਤ ਸਿੱਖਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਆਪਣਾ ਸਟਾਈਲ ਵਿਕਸਤ ਕੀਤਾ ਤੇ ਮੈਟਰੋ ਮਰਫੀ ਕੁਲ ਹਿੰਦ ਸੰਗੀਤ ਮੁਕਾਬਲੇ ਵਿਚ ਵੀ ਅੱਵਲ ਰਹੇ। ਉਨ੍ਹਾਂ 1958 ਵਿਚ ਵੀ. ਸ਼ਾਂਤਾਰਾਮ ਦੀ ਫਿਲਮ 'ਨਵਰੰਗ' ਵਿਚ ਵੀ ਰਾਮ ਚੰਦ੍ਰ ਜਿਹੇ ਸੰਗੀਤਕਾਰ ਦੀ ਡਾਇਰੈਕਸ਼ਨ ਵਿਚ 'ਆਧਾ ਹੈ ਚੰਦਰਮਾ ਰਾਤ ਆਧੀ' ਗਾਣੇ ਨਾਲ ਸੁਰਾਂ ਦਾ ਸਫਰ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿਤਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਯਾਦਗਾਰ ਗਾਣਿਆਂ ਨਾਲ ਗੁੰਮਰਾਹ ਫਿਲਮ ਦਾ 'ਚਲੋ ਇਕ ਬਾਰ ਫਿਰ ਸੇ ਅਜਨਬੀ ਬਣ ਜਾਏ ਹਮ ਦੋਨੋ', ਹਮਰਾਜ ਦਾ 'ਨੀਲੇ ਗਗਨ ਕੇ ਤਲੇ ਧਰਤੀ ਕਾ ਪਿਆਰ ਪਲੇ'.. ਕਿਸੀ ਪੱਥਰ ਕੀ ਮੂਰਤ ਸੇ... ਤੁਮ ਅਗਰ ਸਾਥ ਦੇਣੇ ਕਾ ਵਾਦਾ ਕਰੋ... ਜਿਹੇ ਕਈ ਗੀਤ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ ਪਰ ਦੇਸ਼ ਮੁਲਕਪ੍ਰਸਤਦੀ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਇਕ ਦੂਜੇ ਦੇ ਪੂਰਕ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਫਿਲਮ ਆਦਮੀ ਵਿਚ 'ਕੈਸੀ ਹਸੀਂ ਆਜ ਬਹਾਰੋਂ ਕੀ ਰਾਤ ਹੈ' ਵਿਚ ਆਪਣੇ ਆਦਰਸ਼ ਮੁਹੰਮਦ ਰਫ਼ੀ ਸਾਹਬ ਦੇ ਨਾਲ ਗੀਤ ਗਾਉਣ ਦਾ ਮੌਕਾ ਮਿਲਿਆ। ਇਹੋ ਇਕੋ ਇਕ ਗੀਤ ਹੈ ਜਿਸ ਨੂੰ ਦੋਹਾਂ ਗੁਲੂਕਾਰਾਂ ਨੇ ਰਲ ਕੇ ਗਾਇਆ।
ਅਸਲ ਵਿਚ ਇਹ ਗੀਤ ਮੁਹੰਮਦ ਰਫ਼ੀ ਤੇ ਤਲਤ ਮਹਿਮੂਦ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਵਿਚ ਰਿਕਾਰਡ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ ਪਰ ਮਨੋਜ ਕੁਮਾਰ ਨੇ ਆਪਣੇ ਲਈ ਤਲਤ ਮਹਿਮੂਦ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਰੱਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਇਸ ਨੂੰ ਮਹਿੰਦਰ ਕਪੂਰ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਵਿਚ ਮੁੜ ਤੋਂ ਰਿਕਾਰਡ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਬੀ ਆਰ ਚੋਪੜਾ ਦੀ ਧੂਲ ਕਾ ਫੂਲ, ਹਮਰਾਜ, ਗੁਮਰਾਹ, ਵਕਤ, ਧੁੰਧ ਜਿਹੀਆਂ ਫਿਲਮਾਂ ਨੂੰ ਅਵਾਜ਼ ਦਿਤੀ। ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਨਾਲ ਸਜਿਆ ਮਹਾਭਾਰਤ ਲੜੀਵਾਰ ਦਾ ਟਾਈਟਲ ਸੌਂਗ 'ਅਥ ਸ੍ਰੀਮਹਾਭਾਰਤ ਕਥਾ...' ਅੱਜ ਤਕ ਯਾਦਾਂ ਵਿਚ ਤਾਜ਼ਾ ਹੈ। 27 ਸਤੰਬਰ 2008 ਨੂੰ ਦਿਲ ਦਾ ਦੌਰਾ ਪੈਣ ਕਾਰਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ਪਰ ਭਾਰਤੀ ਫਿਲਮ ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਇਕ ਜੁੱਗ ਦਾ ਅਖ਼ੀਰ ਹੋ ਗਿਆ।
-ਭਾਸ਼ਾ
Saturday, 31 December 2011
ਵੱਡੇ ਕਾਰਜ ਕਰ ਵਿਖਾਉਣ ਵਾਲਾ ਨਿੰਦਰ
ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਦਾ ਜਨਮ 15 ਮਾਰਚ 1975 ਨੂੰ ਮਾਤਾ ਰੂਪ ਰਾਣੀ ਦੀ ਕੁੱਖੋਂ, ਪਿਤਾ ਰੌਸ਼ਨ ਲਾਲ ਦੇ ਘਰ, ਦਾਦਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਲਾਲ ਦੇ ਵਿਹੜੇ, ਪਿੰਡ ਘਗਿਆਣਾ ਵਿਖੇ ਹੋਇਆ। ਭੈਣ ਰਜਿੰਦਰ ਕੌਰ ਦਾ ਵੀਰ ਅਤੇ ਸੁਰਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਦਾ ਮਾਂ ਜਾਇਆ, ਮੈਟ੍ਰਿਕ ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਕੁੱਝ ਸਮਾਂ ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਭਾਗ ਵਿੱਚ ਤੇ ਕੁੱਝ ਸਮਾਂ ਅਦਾਲਤ ਵਿੱਚ ਨੌਕਰੀ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ। ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਕਵੀਸ਼ਰ ਕਰਨੈਲ ਸਿੰਘ ਪਾਰਸ, ਸੰਤੋਖ ਸਿੰਘ ਧੀਰ ਜਗਦੇਵ ਸਿੰਘ ਜੱਸੋਵਾਲ, ਬਲਵੰਤ ਗਾਰਗੀ ਤੇ ਲਾਲ ਚੰਦ ਯਮਲਾ ਜੱਟ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਮਨ ਤੇ ਪਾਉਣ ਵਾਲੇ ਨੇ। ਲਾਲ ਚੰਦ ਯਮਲੇ ਜੱਟ ਨੂੰ ਉਸਤਾਦ ਧਾਰ ਲਿਆ। ਰੇਡੀਓ, ਟੈਲੀਵੀਜ਼ਨ ਤੇ ਵੀ ਗਾਉਣ ਲੱਗ ਪਿਆ।
ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਦੇ ਕੰਮਾਂ ਵੱਲ ਝਾਤ ਮਾਰੀਏ ਤਾਂ ਹੈਰਾਨ ਰਹਿ ਜਾਈਦਾ ਹੈ। ਸਾਹਿਤ ਤੇ ਸੱਭਿਆਚਾਰ ਦੇ ਲਈ ਉਸ ਦੇ ਕੀਤੇ ਯਤਨਾਂ ਨੇ ਹੀ ਉਸ ਨੂੰ 12-13 ਸਾਲਾਂ ਵਿੱਚ ਚਾਰੇ ਪਾਸੇ ਬਹੁਤ ਹਰਮਨ ਪਿਆਰਾ ਬਣਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਜਸਵੰਤ ਸਿੰਘ ਕੰਵਲ, ਰਾਮ ਸਰੂਪ ਅਣਖੀ, ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਬਟਾਲਵੀ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉਸ ਦੇ ਪਾਠਕਾਂ ਦਾ ਘੇਰਾ ਵਿਸ਼ਾਲ ਹੋ ਚੁੱਕਿਆ ਹੈ। ਉਸ ਦੀਆਂ ਲਿਖਤਾਂ ਲੋਕੀਂ ਬੜੇ ਚਾਅ ਨਾਲ ਪੜ੍ਹਦੇ ਹਨ। ਉਸ ਦੀਆਂ ਕਿਤਾਬਾਂ ਦੀ ਮੰਗ ਵੱਧ ਚੁੱਕੀ ਹੈ, ਉਸ ਦੀ ਹਰ ਕਿਤਾਬ ਕਈ-ਕਈ ਐਡੀਸ਼ਨਾਂ ਵਿੱਚ ਛੱਪਦੀ ਹੈ। ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਦੀਆਂ ਕਿਤਾਬਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਕਰੀਏ ਤਾਂ ਬਹੁਤ ਲੰਬੀ ਲਿਸਟ ਬਣ ਚੁੱਕੀ ਹੈ, ਉਸ ਦੀ ਚੌਤੀਂਵੀ ਕਿਤਾਬ ਪਾਠਕਾਂ ਦੇ ਸਨਮੁੱਖ ਹੋ ਚੁੱਕੀ ਹੈ। ਉਹ ਆਪਣੀ ਉਮਰ
ਤੋਂ ਵੱਧ ਕਿਤਾਬਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵਧਾ ਚੁੱਕਾ ਹੈ।
‘ਗੋਧਾ ਅਰਦਲੀ’ (ਨਾਵਲੈਟ) ਮੈਂ ਸਾਂ ਜੱਜ ਦਾ ਅਰਦਲੀ (ਆਪ ਬੀਤੀ) ਮਾਨ ਪੰਜਾਬ ਦੇ (ਰੇਖਾ ਚਿੱਤਰ) ਸੱਚੇ ਦਿਲੋਂ (ਵਾਰਤਕ) ਵੇਲੇ ਕੁਵੇਲੇ (ਸਾਹਿਤਕ ਲੇਖ) ਮੇਰਾ ਰੇਡੀਓ ਨਾਮਾ (ਯਾਦਾਂ) ਸਿਵਿਆਂ ਵਿੱਚ ਖਲੋਤੀ ਬੇਰੀ, ਲਲਿਤ ਨਿਬੰਧ। ਤੁੰਬੀ ਦੇ ਵਾਰਸ (ਜੀਵਨੀਆਂ) ਮੇਰੀ ਅਮਰੀਕਾ ਫੇਰੀ ਸਫਰਨਾਮਾ, ਸਾਜਣ ਮੇਰੇ ਰਾਂਗਲੇ, (ਵਾਰਤਕ) ਅਮਰ ਆਵਾਜ਼, ਜੀਵਨੀ ਲਾਲ ਚੰਦ ਯਮਲਾ ਜੱਟ, ਕੁੱਲੀ ਵਾਲਾ ਫਕੀਰ, (ਜੀਵਨੀ ਪੂਰਨ ਸ਼ਾਹਕੋਟੀ) ਗੁਰਚਰਨ ਸਿੰਘ ਵਿਰਕ, ਜੀਵਨ ਤੇ ਕਲਾ, ਕਰਨੈਲ ਸਿੰਘ ਪਾਰਸ ਰਾਮੂਵਾਲੀਆ, ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਰਚਨਾ, ਜਗਦੇਵ ਸਿੰਘ ਜੱਸੋਵਾਲ, (ਜੀਵਨ ਤੇ ਸਖਸ਼ੀਅਤ) ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਕੋਇਲ ਸੁਰਿੰਦਰ ਕੌਰ (ਜੀਵਨ ਤੇ ਕਲਾ) ਲੋਕ ਗਾਇਕ (ਜੀਵਨੀਆਂ) ਸਾਡੀਆਂ ਲੋਕ ਗਾਇਕਾਵਾਂ (ਰੇਖਾ ਚਿਤੱਰ) ਭੁੱਲੇ ਵਿਸਰੇ (ਲੋਕ ਗਾਇਕ) ਸਾਰੰਗੀ ਦੀ ਹੂਕ ਨਿਬੰਧ, ਵੱਖਰੇ ਰੰਗ ਵਲੈਤ ਦੇ, (ਸਫਰਨਾਮਾ) ਸੁਰਮੰਡਲ ਦੀ ਮੌਤ, (ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਡਾ. ਸੰਜੇ ਬਲਰਾਜ) ਲੋਕ ਗੀਤ ਵਰਗਾ ਹੰਸ, (ਹੰਸ ਰਾਜ ਹੰਸ ਬਾਰੇ) ਵੱਡਮੁੱਲਾ ਪਾਰਸ, ਇੱਕ ਸੀ ਬਲਵੰਤ ਗਾਰਗੀ। (ਲੇਖ ਤੇ ਰੇਖਾ ਚਿੱਤਰ)। ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਬਟਾਲਵੀ (ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਯਾਦਾਂ) ਹਰਨਾਮ ਦਾਸ ਸਹਿਾਰਈ-ਜੀਵਨ ਤੇ ਸਖਸ਼ੀਅਤ (ਲੇਖ) ਮੋਹਨ ਸਪਰਾ ਦੀਆਂ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਸੁਰਾਂ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ, ਸ਼ਹੀਦੇ ਆਜਮ ਭਗਤ ਸਿੰਘ, ਇਤਿਹਾਸ ਦੇ ਖਾਲੀ ਪੰਨੇ, ਚੋਣਵੇਂ ਗੀਤ ਯਮਲਾ ਜੱਟ (ਸੰਪਾਦਿਤ) ਆਦਿ ਉਸਦੀਆਂ ਲਿਖੀਆਂ ਪੁਸਤਕਾਂ ਹਨ।
ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਹੋਰ ਮੈਗਜ਼ੀਨਾਂ, ਅਖਬਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਕਾਲਮ ਲਿਖਦਾ ਰਿਹਾ ਅਤੇ ਲੇਖ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਰਾਮਗੜ੍ਹੀਆ ਮੰਚ ਸਪਤਾਹਿਕ ਉਰਲੀਆਂ-ਪਰਲੀਆਂ 1998 ਤੋਂ 2000 ਤੱਕ ਮਿਊਜਿਕ ਟਾਈਮਜ਼ ਮਾਸਿਕ ਕੁੱਝ ਕਿਹਾ ਤਾਂ 1997 ਤੋਂ 2003 ਅਜੀਤ ਵੀਕਲੀ (ਕੈਨੇਡਾ, ਅਮਰੀਕਾ ਅਤੇ ਇੰਗਲੈਂਡ ਤੋਂ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਤ) ਬਾਵਾ ਬੋਲਦਾ ਹੈ, 2001 ਤੋਂ ਚਾਲੂ ਜਗਬਾਣੀ ਲਈ ਨੇੜੇ-ਤੇੜੇ ਅਤੇ ਦੇਖਿਆ ਸੁਣਿਆ ਦੇਸ਼ ਸੇਵਕ ਵਿੱਚ ਅੱਖਰ ਦੇਣ ਆਵਾਜ਼ਾਂ ਚਾਲੂ ਹੈ। ਅਜੀਤ, ਪੰਜਾਬੀ ਟ੍ਰਿਬਿਊਨ ਤੇ ਹੋਰ ਰਸਾਲਿਆਂ ਵਿੱਚ ਉਸ ਦੀਆਂ ਰਚਨਾਵਾਂ ਆਮ ਹੀ ਪੜ੍ਹਨ ਨੂੰ ਮਿਲਦੀਆਂ ਹਨ।
ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਦਾ ਰੇਡੀਓ ਕਾਰਜ ਅਤੇ ਲੇਖਕ ਦੇਸੀ ਰੇਡੀਓ ਸਾਊਥਹਾਲ ਲਈ 50 ਦਸਤਾਵੇਜ਼ੀ ਸੰਗੀਤਕ ਫੀਚਰਾਂ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ, ਰੇਡੀਓ ਟੋਰਾਂਟੋ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਗੂੰਜ ਲਈ ਤਬਸਰ ਪੇਸ਼ਕਾਰ ਅਤੇ ਨਿਊਜ਼ ਬਰਾਡਕਾਸਟਰ ਵੱਜੋਂ ਕਾਰਜ 2001 ਤੋਂ 2002 ਤੱਕ ਅਕਾਸ਼ਵਾਣੀ ਦੇ ਪਰੋਗਰਾਮ ਅੱਜ ਦੀ ਗੱਲ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਲੋਕ ਗਾਇਕਾਂ, ਗਦਰੀ ਬਾਬਿਆਂ, ਲੇਖਕਾਂ ਅਤੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਖੇਤਰਾਂ ਦੀਆਂ ਉੱਘੀਆਂ ਸਖਸ਼ੀਅਤਾਂ ਸਬੰਧੀ ਦਸਤਾਵੇਜੀ ਫੀਚਰ ਤਿਆਰ ਕੀਤੇ। ਪ੍ਰਦੇਸੀ ਰੇਡੀਓਟੋਰਾਂਟੋ ਅਤੇ ਗੀਤ-ਸੰਗੀਤ ਰੇਡੀਓ, ਵਾਸਟਿਨ-ਵਿਲ, ਕੈਲੇਫੋਰਨੀਆ, ਲਈ ਤਬਸਰਾ ਵਾਚਕ ਵੱਜੋਂ ਕਾਰਜ ਅਤੇ ਦੋ ਦਰਜਨਾਂ ਤੋਂ ਵੱਧ ਲੋਕ ਗਾਇਕਾਂ ਸੰਬਧੀ ਸੰਗੀਤ ਰੂਪਕਾਂ ਅਤੇ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮਾਂ ਦੀ ਪੇਸ਼ਕਾਰੀ, ਦੂਰਦਰਸ਼ਨ ਕੇਂਦਰ ਜਲੰਧਰ ਤੋਂ ਲੋਕ ਸੁਰ ਯੁਵਾ ਯੁਵੀ ਕਵੀ ਸਭਾ ਅਤੇ ਨਵਰੰਗ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਦਾ ਲੇਖਕ ਅਤੇ ਪੇਸ਼ਕਾਰੀ ਏ.ਬੀ.ਸੀ. ਰੇਡੀਓ ਟੋਰਾਂਟੋ (ਕੈਨੇਡਾ) ਲਈ ਫੀਚਰ, ਤਬਸਰਾ ਲੇਖਕ ਕਾਰਜ ਅਤੇ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਕੁੱਝ ਗੱਲਾਂ-ਕੁੱਝ ਗੀਤ ਦੀ ਪੇਸ਼ਕਾਰੀ ਅਤੇ ਅਜੀਤ ਵੀਕਲੀ ਸਮੇਤ ਏਸ਼ੀਅਨ ਬ੍ਰਾਡਕਾਸਟਿੰਗ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਟੋਰਾਂਟੋ ਲਈ ਸੀਨੀਅਰ ਸਟਾਫਰ ਵੱਜੋਂ ਪ੍ਰਸਾਰਨ ਕਾਰਜ ਕੀਤਾ।
ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਦੀਆਂ ਪ੍ਰਾਪਤੀਆਂ ਦੀ ਲਿਸਟ ਕਾਫੀ ਵੱਡੀ ਹੈ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਨਿੰਦਰ ਦੇ ਮੈਂ ਸਾਂ ਜੱਜ ਦਾ ਅਰਦਲੀ ਪੁਸਤਕ ਉੱਤੇ ਅਧਾਰਿਤ ਰੇਡੀਓ ਰੂਪਾਂਤਰ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ (ਵੱਲੋਂ ਏਸ਼ੀਅਨ ਬ੍ਰਾਡਕਾਸਟਿੰਗ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਟੋਰਾਂਟੋ) ਅਤੇ ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲਾ ਵੱਲੋਂ ਸਾਲ 2004-05 ਦੇ ਐੱਮ.ਫਿਲ ਲਈ ਦੂਜੇ ਸਮੈਸਟਰ ਦੌਰਾਨ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਵੱਲੋਂ ਖੋਜ ਪੱਤਰ ਲਿਖਿਆ ਗਿਆ ਅਤੇ ਟੈਲੀ ਫਿਲਮ ਜੱਜ ਦਾ ਅਰਦਲੀ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ, ਭਾਰਤੀ ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਦਿੱਲੀ ਵੱਲੋਂ ਵੀਹਵੀ ਸਦੀ ਦੀ ਚੋਣਵੀਂ ਵਾਰਤਕ ਪੁਸਤਕ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧ ਵਾਰਤਕ ਰਚਨਾ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਭਾਗ ਪੰਜਾਬ ਦੁਆਰਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਪੰਜਾਬ ਕੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਲਾਲ ਚੰਦ ਯਮਲ ਜੱਟ ਅਤੇ ਕਰਨੈਲ ਪਾਰਸ ਬਾਰੇ ਲਿਖੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਇੰਚਾਰਜ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤੇ ਗਏ। ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲਾ ਵੱਲੋਂ ਵਿਸ਼ਵ ਬਾਲ ਕੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਨੁਸਰਤ ਫਤਹਿ ਅਲੀ ਖਾਂ, ਮਾਸਟਰ ਮਦਨ, ਲਤਾ ਮੰਗੇਸ਼ਕਰ, ਉਸਤਾਦ ਬਿਸਮਿਲਾ ਖਾਂ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤੇ ਗਏ। ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵੱਲੋਂ ਪੁਸਤਕ ਲੋਕ ਗਾਇਕ ਦੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾ ਸਾਲ 2005 ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਵੱਲੋਂ ਇੱਕ ਸੀ ਬਲਵੰਤ ਗਾਰਗੀ ਪੁਸਤਕ ਐੱਮ.ਏ. ਪੰਜਾਬੀ ਦੇ ਸਿਲੇਬਸ ਲਈ ਸਹਾਇਕ ਪੁਸਤਕ ਵੱਜੋਂ ਸ਼ਾਮਲ, ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਭਾਗ ਪੰਜਾਬ ਪਟਿਆਲਾ ਵੱਲੋਂ ਸੁਰਿੰਦਰ ਕੌਰ ਜੀਵਨ ਤੇ ਕਲਾ ਪੁਸਤਕ ਦੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾ, ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਵੱਲੋਂ ਪੁਸਤਕ ਸਾਡੀਆਂ ਲੋਕ ਗਾਇਕਾਵਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾ 2008 ਵਿੱਚ ਸਾਲ 1999 ਤੋਂ 2006 ਤੱਕ ਚੋਣਵੇਂ ਹਾਸ ਵਿਅੰਗ ਦੀਆਂ ਸੱਤ ਪੁਸਤਕਾਂ ਵਿੱਚ (ਨੈਸ਼ਨਲ ਬੁੱਕ ਸ਼ਾਪ ਦਿੱਲੀ ਵੱਲੋਂ) ਰਚਨਾਵਾਂ ਸ਼ਾਮਲ ਵੱਖ-ਵੱਖ 50 ਪੁਸਤਕਾਂ ਵਿੱਚ ਲੇਖ ਭੂਮਿਕਾਵਾਂ ਅਤੇ ਰਚਨਾਵਾਂ ਸ਼ਾਮਲ (ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਵਿੱਚ ਅਨੁਵਾਦ) ਐੱਮ.ਐੱਲ.ਸ਼ਰਮਾ ਦੁਆਰਾ ਆਦਿ। ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਨੇ 2005 ਵਿੱਚ ਲੰਡਨ ਦੇ ਪਾਰਲੀਮੈਂਟ ਹਾਊਸ ਵਿਖੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਯਾਦਗਾਰੀ ਸੈਮੀਨਾਰ ਵਿੱਚ ਹਾਸ਼ਮ ਦੀ ਸੱਸੀ ਦਾ ਗਾਇਨ ਕਮਾਲ ਦਾ ਕਰ, ਵਾਹ-ਵਾਹ ਖੱਟਣ ਵਾਲੇ ਨਿੰਦਰ ਨੇ ਟੈਲੀਫਿਲਮ ਟੱਬਰ ਸ਼ੇਖਚਿਲੀਆਂ ਦਾ ਵਿੱਚ ਮੁੱਖ ਕਲਾਕਾਰ ਵੱਜੋਂ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾਈ।
ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਦੀਆਂ ਅਹੁਦੇਦਾਰੀਆਂ ਸਾਬਕਾ ਮੈਂਬਰ ਰਾਜ ਸਲਾਹਕਾਰ ਬੋਰਡ (ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਭਾਗ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ), ਮੈਂਬਰ ਜਿਲ੍ਹਾ ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਕਾਸ ਕਮੇਟੀ (ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ), ਸਰਪ੍ਰਸਤ ਯਮਲਾ ਜੱਟ, ਟਰੱਸਟ ਫਰਿਜਨੋਂ (ਕੈਲੇਫੋਰਨੀਆ) ਸਾਬਕਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਸਕੱਤਰ (ਸਾਹਿਤ ਸਭਾ ਘਗਿਆਣਾ) ਪ੍ਰਧਾਨ, ਵੈਲਕਮ ਕਲੱਬ ਸਾਦਿਕ, ਮੈਂਬਰ ਕੇਂਦਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਲੇਖਕ ਸਭਾ (ਸੇਖੋਂ) ਰਜਿ. ਆਦਿ। ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਬਹੁਤ ਦੂਰ ਤੱਕ ਘੁੰਮ ਆਇਆ ਹੈ। ਜਿਵੇਂ ਕੈਨੇਡਾ ਤਿੰਨ ਵਾਰ ਅਮਰੀਕਾ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਇੱਕ ਵਾਰ ਇੰਗਲੈਂਡ ਅਤੇ ਇੱਕ ਵਾਰ ਆਸਟ੍ਰੇਲੀਆ ਵੀ ਜਾ ਆਇਆ ਹੈ। ਹੁਣ ਨਿੰਦਰ ਲਈ ਵਿਦੇਸ਼ ਤਾਂ ਪਿੰਡ ਦੀ ਨਿਆਈ ਹੈ। ਵਿਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਉਸ ਦੇ ਪਾਠਕਾਂ ਦਾ ਘੇਰਾ ਵਿਸ਼ਾਲ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਮਾਣ-ਸਨਮਾਨ ਨਿੰਦਰ ਨੂੰ ਅਜੇ ਆਪਣੇ ਘਰੋਂ ਮਤਲਬ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚੋਂ ਨਹੀਂ ਮਿਲਿਆ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਉਸ ਦੇ ਕਾਰਜਾਂ ਲਈ ਮਿਲਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਵਿਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਉਸ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਮਾਣ-ਸਨਮਾਨ ਮਿਲਿਆ ਹੈ।
-Dashan singh Preetiman
‘ਗੋਧਾ ਅਰਦਲੀ’ (ਨਾਵਲੈਟ) ਮੈਂ ਸਾਂ ਜੱਜ ਦਾ ਅਰਦਲੀ (ਆਪ ਬੀਤੀ) ਮਾਨ ਪੰਜਾਬ ਦੇ (ਰੇਖਾ ਚਿੱਤਰ) ਸੱਚੇ ਦਿਲੋਂ (ਵਾਰਤਕ) ਵੇਲੇ ਕੁਵੇਲੇ (ਸਾਹਿਤਕ ਲੇਖ) ਮੇਰਾ ਰੇਡੀਓ ਨਾਮਾ (ਯਾਦਾਂ) ਸਿਵਿਆਂ ਵਿੱਚ ਖਲੋਤੀ ਬੇਰੀ, ਲਲਿਤ ਨਿਬੰਧ। ਤੁੰਬੀ ਦੇ ਵਾਰਸ (ਜੀਵਨੀਆਂ) ਮੇਰੀ ਅਮਰੀਕਾ ਫੇਰੀ ਸਫਰਨਾਮਾ, ਸਾਜਣ ਮੇਰੇ ਰਾਂਗਲੇ, (ਵਾਰਤਕ) ਅਮਰ ਆਵਾਜ਼, ਜੀਵਨੀ ਲਾਲ ਚੰਦ ਯਮਲਾ ਜੱਟ, ਕੁੱਲੀ ਵਾਲਾ ਫਕੀਰ, (ਜੀਵਨੀ ਪੂਰਨ ਸ਼ਾਹਕੋਟੀ) ਗੁਰਚਰਨ ਸਿੰਘ ਵਿਰਕ, ਜੀਵਨ ਤੇ ਕਲਾ, ਕਰਨੈਲ ਸਿੰਘ ਪਾਰਸ ਰਾਮੂਵਾਲੀਆ, ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਰਚਨਾ, ਜਗਦੇਵ ਸਿੰਘ ਜੱਸੋਵਾਲ, (ਜੀਵਨ ਤੇ ਸਖਸ਼ੀਅਤ) ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਕੋਇਲ ਸੁਰਿੰਦਰ ਕੌਰ (ਜੀਵਨ ਤੇ ਕਲਾ) ਲੋਕ ਗਾਇਕ (ਜੀਵਨੀਆਂ) ਸਾਡੀਆਂ ਲੋਕ ਗਾਇਕਾਵਾਂ (ਰੇਖਾ ਚਿਤੱਰ) ਭੁੱਲੇ ਵਿਸਰੇ (ਲੋਕ ਗਾਇਕ) ਸਾਰੰਗੀ ਦੀ ਹੂਕ ਨਿਬੰਧ, ਵੱਖਰੇ ਰੰਗ ਵਲੈਤ ਦੇ, (ਸਫਰਨਾਮਾ) ਸੁਰਮੰਡਲ ਦੀ ਮੌਤ, (ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਡਾ. ਸੰਜੇ ਬਲਰਾਜ) ਲੋਕ ਗੀਤ ਵਰਗਾ ਹੰਸ, (ਹੰਸ ਰਾਜ ਹੰਸ ਬਾਰੇ) ਵੱਡਮੁੱਲਾ ਪਾਰਸ, ਇੱਕ ਸੀ ਬਲਵੰਤ ਗਾਰਗੀ। (ਲੇਖ ਤੇ ਰੇਖਾ ਚਿੱਤਰ)। ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਬਟਾਲਵੀ (ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਯਾਦਾਂ) ਹਰਨਾਮ ਦਾਸ ਸਹਿਾਰਈ-ਜੀਵਨ ਤੇ ਸਖਸ਼ੀਅਤ (ਲੇਖ) ਮੋਹਨ ਸਪਰਾ ਦੀਆਂ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਸੁਰਾਂ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ, ਸ਼ਹੀਦੇ ਆਜਮ ਭਗਤ ਸਿੰਘ, ਇਤਿਹਾਸ ਦੇ ਖਾਲੀ ਪੰਨੇ, ਚੋਣਵੇਂ ਗੀਤ ਯਮਲਾ ਜੱਟ (ਸੰਪਾਦਿਤ) ਆਦਿ ਉਸਦੀਆਂ ਲਿਖੀਆਂ ਪੁਸਤਕਾਂ ਹਨ।
ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਹੋਰ ਮੈਗਜ਼ੀਨਾਂ, ਅਖਬਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਕਾਲਮ ਲਿਖਦਾ ਰਿਹਾ ਅਤੇ ਲੇਖ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਰਾਮਗੜ੍ਹੀਆ ਮੰਚ ਸਪਤਾਹਿਕ ਉਰਲੀਆਂ-ਪਰਲੀਆਂ 1998 ਤੋਂ 2000 ਤੱਕ ਮਿਊਜਿਕ ਟਾਈਮਜ਼ ਮਾਸਿਕ ਕੁੱਝ ਕਿਹਾ ਤਾਂ 1997 ਤੋਂ 2003 ਅਜੀਤ ਵੀਕਲੀ (ਕੈਨੇਡਾ, ਅਮਰੀਕਾ ਅਤੇ ਇੰਗਲੈਂਡ ਤੋਂ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਤ) ਬਾਵਾ ਬੋਲਦਾ ਹੈ, 2001 ਤੋਂ ਚਾਲੂ ਜਗਬਾਣੀ ਲਈ ਨੇੜੇ-ਤੇੜੇ ਅਤੇ ਦੇਖਿਆ ਸੁਣਿਆ ਦੇਸ਼ ਸੇਵਕ ਵਿੱਚ ਅੱਖਰ ਦੇਣ ਆਵਾਜ਼ਾਂ ਚਾਲੂ ਹੈ। ਅਜੀਤ, ਪੰਜਾਬੀ ਟ੍ਰਿਬਿਊਨ ਤੇ ਹੋਰ ਰਸਾਲਿਆਂ ਵਿੱਚ ਉਸ ਦੀਆਂ ਰਚਨਾਵਾਂ ਆਮ ਹੀ ਪੜ੍ਹਨ ਨੂੰ ਮਿਲਦੀਆਂ ਹਨ।
ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਦਾ ਰੇਡੀਓ ਕਾਰਜ ਅਤੇ ਲੇਖਕ ਦੇਸੀ ਰੇਡੀਓ ਸਾਊਥਹਾਲ ਲਈ 50 ਦਸਤਾਵੇਜ਼ੀ ਸੰਗੀਤਕ ਫੀਚਰਾਂ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ, ਰੇਡੀਓ ਟੋਰਾਂਟੋ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਗੂੰਜ ਲਈ ਤਬਸਰ ਪੇਸ਼ਕਾਰ ਅਤੇ ਨਿਊਜ਼ ਬਰਾਡਕਾਸਟਰ ਵੱਜੋਂ ਕਾਰਜ 2001 ਤੋਂ 2002 ਤੱਕ ਅਕਾਸ਼ਵਾਣੀ ਦੇ ਪਰੋਗਰਾਮ ਅੱਜ ਦੀ ਗੱਲ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਲੋਕ ਗਾਇਕਾਂ, ਗਦਰੀ ਬਾਬਿਆਂ, ਲੇਖਕਾਂ ਅਤੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਖੇਤਰਾਂ ਦੀਆਂ ਉੱਘੀਆਂ ਸਖਸ਼ੀਅਤਾਂ ਸਬੰਧੀ ਦਸਤਾਵੇਜੀ ਫੀਚਰ ਤਿਆਰ ਕੀਤੇ। ਪ੍ਰਦੇਸੀ ਰੇਡੀਓਟੋਰਾਂਟੋ ਅਤੇ ਗੀਤ-ਸੰਗੀਤ ਰੇਡੀਓ, ਵਾਸਟਿਨ-ਵਿਲ, ਕੈਲੇਫੋਰਨੀਆ, ਲਈ ਤਬਸਰਾ ਵਾਚਕ ਵੱਜੋਂ ਕਾਰਜ ਅਤੇ ਦੋ ਦਰਜਨਾਂ ਤੋਂ ਵੱਧ ਲੋਕ ਗਾਇਕਾਂ ਸੰਬਧੀ ਸੰਗੀਤ ਰੂਪਕਾਂ ਅਤੇ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮਾਂ ਦੀ ਪੇਸ਼ਕਾਰੀ, ਦੂਰਦਰਸ਼ਨ ਕੇਂਦਰ ਜਲੰਧਰ ਤੋਂ ਲੋਕ ਸੁਰ ਯੁਵਾ ਯੁਵੀ ਕਵੀ ਸਭਾ ਅਤੇ ਨਵਰੰਗ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਦਾ ਲੇਖਕ ਅਤੇ ਪੇਸ਼ਕਾਰੀ ਏ.ਬੀ.ਸੀ. ਰੇਡੀਓ ਟੋਰਾਂਟੋ (ਕੈਨੇਡਾ) ਲਈ ਫੀਚਰ, ਤਬਸਰਾ ਲੇਖਕ ਕਾਰਜ ਅਤੇ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਕੁੱਝ ਗੱਲਾਂ-ਕੁੱਝ ਗੀਤ ਦੀ ਪੇਸ਼ਕਾਰੀ ਅਤੇ ਅਜੀਤ ਵੀਕਲੀ ਸਮੇਤ ਏਸ਼ੀਅਨ ਬ੍ਰਾਡਕਾਸਟਿੰਗ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਟੋਰਾਂਟੋ ਲਈ ਸੀਨੀਅਰ ਸਟਾਫਰ ਵੱਜੋਂ ਪ੍ਰਸਾਰਨ ਕਾਰਜ ਕੀਤਾ।
ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਦੀਆਂ ਪ੍ਰਾਪਤੀਆਂ ਦੀ ਲਿਸਟ ਕਾਫੀ ਵੱਡੀ ਹੈ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਨਿੰਦਰ ਦੇ ਮੈਂ ਸਾਂ ਜੱਜ ਦਾ ਅਰਦਲੀ ਪੁਸਤਕ ਉੱਤੇ ਅਧਾਰਿਤ ਰੇਡੀਓ ਰੂਪਾਂਤਰ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ (ਵੱਲੋਂ ਏਸ਼ੀਅਨ ਬ੍ਰਾਡਕਾਸਟਿੰਗ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਟੋਰਾਂਟੋ) ਅਤੇ ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲਾ ਵੱਲੋਂ ਸਾਲ 2004-05 ਦੇ ਐੱਮ.ਫਿਲ ਲਈ ਦੂਜੇ ਸਮੈਸਟਰ ਦੌਰਾਨ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਵੱਲੋਂ ਖੋਜ ਪੱਤਰ ਲਿਖਿਆ ਗਿਆ ਅਤੇ ਟੈਲੀ ਫਿਲਮ ਜੱਜ ਦਾ ਅਰਦਲੀ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ, ਭਾਰਤੀ ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਦਿੱਲੀ ਵੱਲੋਂ ਵੀਹਵੀ ਸਦੀ ਦੀ ਚੋਣਵੀਂ ਵਾਰਤਕ ਪੁਸਤਕ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧ ਵਾਰਤਕ ਰਚਨਾ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਭਾਗ ਪੰਜਾਬ ਦੁਆਰਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਪੰਜਾਬ ਕੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਲਾਲ ਚੰਦ ਯਮਲ ਜੱਟ ਅਤੇ ਕਰਨੈਲ ਪਾਰਸ ਬਾਰੇ ਲਿਖੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਇੰਚਾਰਜ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤੇ ਗਏ। ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲਾ ਵੱਲੋਂ ਵਿਸ਼ਵ ਬਾਲ ਕੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਨੁਸਰਤ ਫਤਹਿ ਅਲੀ ਖਾਂ, ਮਾਸਟਰ ਮਦਨ, ਲਤਾ ਮੰਗੇਸ਼ਕਰ, ਉਸਤਾਦ ਬਿਸਮਿਲਾ ਖਾਂ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤੇ ਗਏ। ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵੱਲੋਂ ਪੁਸਤਕ ਲੋਕ ਗਾਇਕ ਦੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾ ਸਾਲ 2005 ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਵੱਲੋਂ ਇੱਕ ਸੀ ਬਲਵੰਤ ਗਾਰਗੀ ਪੁਸਤਕ ਐੱਮ.ਏ. ਪੰਜਾਬੀ ਦੇ ਸਿਲੇਬਸ ਲਈ ਸਹਾਇਕ ਪੁਸਤਕ ਵੱਜੋਂ ਸ਼ਾਮਲ, ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਭਾਗ ਪੰਜਾਬ ਪਟਿਆਲਾ ਵੱਲੋਂ ਸੁਰਿੰਦਰ ਕੌਰ ਜੀਵਨ ਤੇ ਕਲਾ ਪੁਸਤਕ ਦੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾ, ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਵੱਲੋਂ ਪੁਸਤਕ ਸਾਡੀਆਂ ਲੋਕ ਗਾਇਕਾਵਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾ 2008 ਵਿੱਚ ਸਾਲ 1999 ਤੋਂ 2006 ਤੱਕ ਚੋਣਵੇਂ ਹਾਸ ਵਿਅੰਗ ਦੀਆਂ ਸੱਤ ਪੁਸਤਕਾਂ ਵਿੱਚ (ਨੈਸ਼ਨਲ ਬੁੱਕ ਸ਼ਾਪ ਦਿੱਲੀ ਵੱਲੋਂ) ਰਚਨਾਵਾਂ ਸ਼ਾਮਲ ਵੱਖ-ਵੱਖ 50 ਪੁਸਤਕਾਂ ਵਿੱਚ ਲੇਖ ਭੂਮਿਕਾਵਾਂ ਅਤੇ ਰਚਨਾਵਾਂ ਸ਼ਾਮਲ (ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਵਿੱਚ ਅਨੁਵਾਦ) ਐੱਮ.ਐੱਲ.ਸ਼ਰਮਾ ਦੁਆਰਾ ਆਦਿ। ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਨੇ 2005 ਵਿੱਚ ਲੰਡਨ ਦੇ ਪਾਰਲੀਮੈਂਟ ਹਾਊਸ ਵਿਖੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਯਾਦਗਾਰੀ ਸੈਮੀਨਾਰ ਵਿੱਚ ਹਾਸ਼ਮ ਦੀ ਸੱਸੀ ਦਾ ਗਾਇਨ ਕਮਾਲ ਦਾ ਕਰ, ਵਾਹ-ਵਾਹ ਖੱਟਣ ਵਾਲੇ ਨਿੰਦਰ ਨੇ ਟੈਲੀਫਿਲਮ ਟੱਬਰ ਸ਼ੇਖਚਿਲੀਆਂ ਦਾ ਵਿੱਚ ਮੁੱਖ ਕਲਾਕਾਰ ਵੱਜੋਂ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾਈ।
ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਦੀਆਂ ਅਹੁਦੇਦਾਰੀਆਂ ਸਾਬਕਾ ਮੈਂਬਰ ਰਾਜ ਸਲਾਹਕਾਰ ਬੋਰਡ (ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਭਾਗ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ), ਮੈਂਬਰ ਜਿਲ੍ਹਾ ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਕਾਸ ਕਮੇਟੀ (ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ), ਸਰਪ੍ਰਸਤ ਯਮਲਾ ਜੱਟ, ਟਰੱਸਟ ਫਰਿਜਨੋਂ (ਕੈਲੇਫੋਰਨੀਆ) ਸਾਬਕਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਸਕੱਤਰ (ਸਾਹਿਤ ਸਭਾ ਘਗਿਆਣਾ) ਪ੍ਰਧਾਨ, ਵੈਲਕਮ ਕਲੱਬ ਸਾਦਿਕ, ਮੈਂਬਰ ਕੇਂਦਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਲੇਖਕ ਸਭਾ (ਸੇਖੋਂ) ਰਜਿ. ਆਦਿ। ਨਿੰਦਰ ਘੁਗਿਆਣਵੀ ਬਹੁਤ ਦੂਰ ਤੱਕ ਘੁੰਮ ਆਇਆ ਹੈ। ਜਿਵੇਂ ਕੈਨੇਡਾ ਤਿੰਨ ਵਾਰ ਅਮਰੀਕਾ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਇੱਕ ਵਾਰ ਇੰਗਲੈਂਡ ਅਤੇ ਇੱਕ ਵਾਰ ਆਸਟ੍ਰੇਲੀਆ ਵੀ ਜਾ ਆਇਆ ਹੈ। ਹੁਣ ਨਿੰਦਰ ਲਈ ਵਿਦੇਸ਼ ਤਾਂ ਪਿੰਡ ਦੀ ਨਿਆਈ ਹੈ। ਵਿਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਉਸ ਦੇ ਪਾਠਕਾਂ ਦਾ ਘੇਰਾ ਵਿਸ਼ਾਲ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਮਾਣ-ਸਨਮਾਨ ਨਿੰਦਰ ਨੂੰ ਅਜੇ ਆਪਣੇ ਘਰੋਂ ਮਤਲਬ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚੋਂ ਨਹੀਂ ਮਿਲਿਆ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਉਸ ਦੇ ਕਾਰਜਾਂ ਲਈ ਮਿਲਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਵਿਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਉਸ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਮਾਣ-ਸਨਮਾਨ ਮਿਲਿਆ ਹੈ।
-Dashan singh Preetiman
Friday, 30 December 2011
ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਨੂੰ ਤਰਸ ਰਿਹਾ ਸਮਾਜਵਾਦ
ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਨੂੰ ਤਰਸਦੇ ਭਾਰਤੀ ਕਮਿਊਨਿਸਟ
-ਚੋਟੀ ਦੇ ਵਿਦਵਾਨ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਕਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਇਕ ਦਿਨ ਸਟੇਟ (ਰਾਜਭਾਗ) ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿਣੀ ਤੇ ਕਮਿਊਨ ਆ ਜਾਣੈ, ਫੇਰ ਇਕ ਦਿਨ ਕਮਿਊਨ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿਣਾ ਤੇ ਇਜ਼ਮ (ਵਾਦ) ਰਹਿ ਜਾਵੇਗਾ ਤੇ ਇਕ ਦਿਨ ਵਾਦ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿਣਾ ਸਗੋਂ ਮੈਂ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਾਂਗਾ ਪਰ ਕਮਿਊਨ ਰਹਿ ਜਾਵੇਗਾ। ਇਸ ਕਮਿਊਨ ਜਾਂ ਸਮੂਹਕ ਰਹਿਣ ਸਹਿਣ ਨੂੰ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਕਮਿਊਨ ਵਜੋਂ ਪਰਭਾਸ਼ਤ ਕੀਤਾ। ਇਸੇ ਕਮਿਊਨ ਦੀ ਮੰਜ਼ਲ ਕਰ ਕੇ ਕਮਿਊਨ ਲਿਆਉਣ ਲਈ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰ ਰਹੇ ਸਿਆਸੀ ਮਿਸ਼ਨਰੀ ਨੂੰ 'ਕਮਿਊਨ ਇਸਟ' ਜਾਂ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਭਾਵ ਕਮਿਊਨ ਜਿਹਦਾ ਸਿਆਸੀ ਇਸ਼ਟ ਹੋਵੇ ਉਹ ਹੈ ਕਮਿਊਨਿਸਟ..।
ਪਰ ਸੋਚਣ ਵਾਲੀ ਗੱਲ ਤਾਂ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਜੇ ਮਾਰਕਸ ਦੀ ਸੋਚ ਵੀ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਫੇਰ ਫ਼ਲਸਫ਼ਾ ਕਿਹਨੂੰ ਕਹਾਂਗੇ? ਮਾਰਕਸ ਦਾ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਤਾਂ ਇਵੇਂ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਕਿ ਜਿਵੇਂ ਕੋਈ ਪੁਰਾਤਨ ਰਾਜੇ ਦਾ ਰਾਜਭਾਗ ਲਿਆਉਣ ਦੀ ਗੱਲ ਹੋ ਰਹੀ ਹੋਵੇ। ਅਸਲ ਵਿਚ ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਸਿਧਾਂਤ ਨਰਮ ਤੇ ਸਾਹਿਤਕ ਸ਼ਬਦਾਵਲੀ ਵਾਲੇ ਹਨ ਅਤੇ ਡੌਗਮਾ (ਜੜ੍ਹ ਵਿਚਾਰ) ਹੁੰਦੇ ਹੋਏ ਵੀ ਤਬਦੀਲੀ ਪਸੰਦ ਹਨ ਕਿ ਮਾਰਕਸ ਦਾ ਇਤਿਹਾਸਕ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਕਿਸੇ ਵੀ ਹਾਲਤ ਵਿਚ 'ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ' ਵਰਗੇ ਦਕੀਆਨੂਸੀ ਸੰਕਲਪ ਵਿਚ ਬੰਨ੍ਹਿਆ ਹੀ ਨਹੀਂ ਜਾ ਸਕਦਾ। ਜਿਵੇਂ ਇਕ ਮਿਸਾਲ ਲੈ ਲਓ ਕਿ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਨਾ ਤਾਂ ਮੀਟ, ਆਂਡੇ ਖਾਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਹੈ ਤੇ ਨਾਂ ਹੀ ਛੱਡਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਹੈ। ਨਾਂ ਤਾਂ ਕੋਈ ਰਟਣ ਮੰਤਰ ਜਪਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਹੈ ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਜਪਣ ਤੋਂ ਦੂਰ ਰਹਿਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਹੈ। ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਕੋਈ ਰਟਣ ਮੰਤਰ ਨਹੀਂ ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਭਾਈਚਾਰਕ ਵਿਖਾਵੇ ਦੀ ਕਿਰਿਆ ਸਗੋਂ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਸ਼ੁੱਧ 'ਵਿਚਾਰਵਾਦ' ਹੈ। ਵਿਚਾਰ ਤੋਂ ਭਾਵ ਥੌਟ ਵੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਵਿਚਾਰ ਦਾ ਭਾਵ ਆਈਡੀਆ ਵੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਸਮਾਜਕ ਤੇ ਆਰਥਕ ਦੁੱਖਾਂ ਦੇ ਭੰਨੇ ਬੰਦੇ ਦੇ ਮਨ ਵਿਚ ਅਨੇਕਾਂ ਸੰਸੇ, ਅਨੇਕਾਂ ਡਰ ਤੇ ਅਨੇਕਾਂ 'ਵਿਚਾਰ' ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਪਰ ਉਹ ਵਿਚਾਰ, ਅਸਲ ਵਿਚ ਚਿੰਤਾ ਤੋਂ ਉਪਜੀਆਂ ਮਾਨਸਕ ਤਰੰਗਾਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ। ਪਰ ਚਿੰਤਾ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਆਉਣਾ ਜਾਂ ਚਿੰਤਾ ਦੂਰ ਕਰਨ ਦੇ ਉਪਾਅ ਸੋਚਣੇ ਤੇ ਅਮਲ ਕਰਨਾ ਇਹ ਸਭ ਆਈਡੀਏ ਜਾਂ 'ਅਸਲੀ ਵਿਚਾਰ' ਨੂੰ ਪਰਭਾਸ਼ਤ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਜੇ ਕੋਈ ਸਾਡੀ ਪੁਰਾਤਨ ਪਸੰਦ ਭਾਰਤੀ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤੀ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਵਤ 'ਭਰਾ' ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਨੂੰ ਵੀ ਕਿਸੇ ਪੁਰਾਣੇ ਮਰਿਆਦਤ ਰਾਜੇ ਦੇ ਮਿਸਾਲੀ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਵਾਂਗ ਹੀ ਸਮਝਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਹ ਕਿਰਪਾ ਕਰਕੇ ਸਿਆਣੇ ਕਮਿਊਨਿਸਟਾਂ ਨੂੰ ਲੱਭੇ ਜਾਂ ਖੁਦ ਮਾਰਕਸ ਦੀਆਂ ਲਿਖਤਾਂ ਵਿਚੋਂ ਦੀ ਲੰਘੇ। ਭਾਰਤੀ ਕਮਿਊਸਿਨਟਾਂ ਦੀ ਕਮਿਊਨਇਜ਼ਮ ਵਾਸਤੇ ਪ੍ਰੀਬੱਧਤਾ ਘੱਟ ਨਹੀਂ ਅੰਗੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਅਸਲ ਵਿਚ ਭਾਰਤੀ ਧਰਮ ਬਾਰੇ ਮਾਓ ਨੇ ਇਕ ਵਾਰ ਟਿਪਣੀ ਕੀਤੀ ਸੀ, ਬਈ, ''ਭਾਰਤੀ ਧਰਮ ਅਸਲ ਵਿਚ ਧਰਮ ਹੀ ਨਹੀਂ ਨੇ''। ਇਸ ਤੋਂ ਪਤਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਕਿ ਚੀਨ ਵਿਚ ਚੀਨੀ ਜਨਤਾ ਦੇ ਸੁਭਾਅ, ਭੁਗੋਲਿਕ ਹਾਲਾਤ ਤੇ ਹੋਰ ਸਥਿਤੀਆਂ ਨੂੰ ਵੀਚਾਰ ਕੇ ਇਨਕਲਾਬ ਲਿਆਉਣ ਵਾਲਾ ਮਾਓ ਭਾਰਤੀ ਪੁਜਾਰੀਵਾਦ ਦੇ ਆਦਰਸ਼-ਜਾਲ ਤੋਂ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਾਣੂ ਸੀ। ਮਾਓ ਵਲੋਂ ਇੰਨਾ ਕਹਿਣਾ ਕਿ ''ਭਾਰਤੀ ਧਰਮ ਅਸਲ ਵਿਚ ਧਰਮ ਹੈ ਹੀ ਨਹੀਂ ਹਨ''। -ਇਹ ਟਿਪਣੀ ਵੱਡੀ ਵਿਆਖਿਆ ਵੱਲ ਇਸ਼ਾਰਾ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਮਾਓ ਜਾਣ ਚੁੱਕਾ ਸੀ ਕਿ ਜਿਵੇਂ ਬੁਧ ਧਰਮ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ ਨੇ ਇਸ ਫ਼ਲਸਫ਼ੇ ਨੂੰ ਟੱਲੀਆਂ ਖੜਕਾਉਣ ਤਕ ਮਹਿਦੂਦ ਕੀਤਾ ਹੋਇਆ ਹੈ ਇਵੇਂ ਹੀ ਭਾਰਤ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ ਤਬਕੇ ਦੀ ਹਾਲਤ ਤਾਂ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਤੋਂ ਕਿਤੇ ਮਾੜੀ ਹੈ। ਜਾਤ ਪਾਤ ਜਨਮ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਹੈ ਤੇ ਬਦਲੀ ਨੀਂ ਜਾ ਸਕਦੀ। ਬੰਦਿਆਂ ਦੇ ਕੰਮ ਤੇ ਕਿੱਤੇ ਵੀ ਤਕਰੀਬਨ ਜਨਮ ਤੋਂ ਵੰਡੇ ਹਨ ਹਾਂ ਹੁਣ ਭਾਵੇਂ ਨਵੀਂ ਚੇਤਨਾ ਮੁਜਬ ਲੋਕ ਕਿੱਤੇ ਤੇ ਸੁਭਾਅ ਬਦਲ ਰਹੇ ਹਨ ਜਿਸ ਕਰਕੇ ਜਾਤ-ਗੋਤ ਪਰਗਟ ਕਰਨ ਤੇ ਲੁਕਾਅ ਕੇ ਰੱਖਣ ਦਾ ਰੁਝਾਨ ਪਰਗਟ ਹੋਇਆ। ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੁਖੀ ਸਮਾਜਾਂ ਵਿਚ ਇਨਕਲਾਬ ਲਿਆਉਣ ਦਾ ਆਈਡੀਆ ਫੈਲਾਇਆ ਸੀ ਓਥੇ ਆਰਥਕ ਜਮਾਤਾਂ ਸਨ, ਆਹ ਜਾਤ ਵਾਲਾ ਜਨਮਜਾਤ ਪੰਗਾ ਓਥੇ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਮਾਰਕਸ ਅਸਲ ਵਿਚ ਕਮਿਊਨਇਜ਼ਮ ਦਾ ਵਿਚਾਰ 'ਦਾਤਾ' ਹੈ ਨਾ ਕਿ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦੀ ਕਥੱਕੜ। ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਤੋਂ ਤਾਂ ਇਵੇਂ ਜਾਪਦਾ ਹੈ ਕਿ ਜਿਵੇਂ ਕਿਸੇ ਫਰੇਮ ਵਿਚ ਬੱਝ ਕੇ ਬੰਦੇ ਨੇ ਕੰਮ ਕਰਨਾ ਹੈ ਤੇ ਉਸ ਦੀ ਯੂਨੀਫਾਰਮ, ਉਸ ਦੀ ਸ਼ਬਦਾਵਲੀ ਉਸ ਨੇ ਕਿਵੇਂ ਉਠਣਾ ਬੈਠਣਾ ਹੈ, ਬਾਰੇ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਕੋਈ ਆਦਰਸ਼ ਮਿੱਥ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਪਰ ਸੱਚਾਈ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਬੰਦੇ ਨੂੰ ਸਹਿਜ ਹੋਣ ਵੱਲ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਮਾਰਕਸੀ ਕਾਰਕੁੰਨ ਦੀ ਕੋਈ ਪੱਕੀ ਯੂਨੀਫਾਰਮ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ ਤੇ ਨਾਂ ਹੀ ਉਸ ਨੇ ਕੀ ਖਾਣਾ ਹੈ ਤੇ ਕੀ ਨਹੀਂ ਖਾਣਾ ਹੈ? ਕਿਹੜੇ ਮੰਤਰ ਦਾ ਰੱਟਾ ਲਾਉਣਾ ਹੈ, ਆਦਿ ਦਾ ਕੋਈ ਬੰਧੇਜ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦੇ ਸਿਆਸੀ ਲੀਡਰਾਂ ਨਾਲੋਂ ਇਸ ਵਾਦ ਬਾਰੇ ਮਾਰਕਸੀ ਨਜ਼ਰੀਏ ਤੋਂ ਕਹਾਣੀਆਂ ਲਿਖਣ ਵਾਲੇ ਤੇ ਮਾਰਕਸੀ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਮੁਤਾਬਕ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਲਿਖਣ ਵਾਲੇ ਵੱਧ ਜਾਣਦੇ ਹਨ। ਕਿਉਂਕਿ ਲੇਖਕ ਤੇ ਕਵੀ ਹਮੇਸ਼ਾ ਦਿਲ ਦੀ ਦੁਨੀਆਂ ਵਿਚ ਜੀਉਂਦੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਤੇ ਬਾਕੀ ਸਮਾਜ ਹਨੇਰੇ ਵਿਚ। ਚੁਸਤ ਲੀਡਰ ਲੋਕ ਜੁਗਾੜੀ ਸ਼੍ਰੇਣੀ ਵਿਚ ਆਉਂਦੇ ਹਨ। ਲੀਡਰਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਦਰਅਸਲ, ਵਿਚਾਰਵਾਦੀ ਕਵੀਆਂ ਤੇ ਲੇਖਕਾਂ ਦੀਆਂ ਲਿਖਤਾਂ ਨੇ ਹੀ 'ਤਿਆਰ' ਕੀਤਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਇਕ ਬੜੀ ਭੈੜੀ ਗੱਲ ਰੋਜ਼ ਵਾਪਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਜਦੋਂ ਵੀ ਕੋਈ ਬੰਦਾ ਬਿਜਲੀ ਦਾ ਬਿਲ ਜਮ੍ਹਾ ਕਰਾਉਣ ਚਲਾ ਜਾਵੇ ਜਾਂ ਕਿਸੇ ਸਰਕਾਰੀ ਮਹਿਕਮੇ ਵਿਚ ਚਲਾ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਉਥੇ ਕੁਝ ਨਾਅਰੇਬਾਜ਼ ਸੱਜਣ ਦਰੀ ਵਿਛਾਅ ਕੇ ਨਾਅਰੇਬਾਜ਼ੀ ਕਰਦੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਤੇ ਕੁਝ ਸੱਜਣ ਜ਼ਿੰਦਾਬਾਦ ਕਰਦੇ ਕੰਨੀਂ ਪੈਂਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਲੋਕ ਕਹਿਣ ਕਹਾਉਣ ਨੂੰ ਕਾਮਰੇਡ ਹੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਜਦਕਿ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦੇ ਟੀਚੇ ਕਮਿਊਨਇਜ਼ਮ ਨਾਲੋਂ ਇਸ ਤਬਕੇ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਤਨਖਾਹ ਵਧਾਉਣ ਤੇ ਭੱਤੇ ਵੱਧ ਲੈਣ ਤਕ ਗਰਜ਼ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਨੂੰ ਸਮਝਣ ਦੀ ਵੱਡੀ ਯੋਗਤਾ ਵਿਦਵਤਾ ਹੈ ਜੇ ਕੋਈ ਸੱਜਣ ਕਹੇ ਕਿ ਉਹ ਵਿਦਵਤਾ ਤਿੱਖੀ ਕੀਤੇ ਬਗੈਰ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦੇ ਸ਼ਾਨਾਮੱਤੇ ਪਹਿਲੂ ਤੇ ਲੁਟੇਰੇ ਤਬਕਿਆਂ ਦੇ ਲੀਚੜ ਕਿਰਦਾਰ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇਗਾ ਤਾਂ ਇਹ ਉਸ ਦੀ 'ਆਦਰਸ਼ਵਾਦੀ ਬਚਕਾਨਾ ਭੁੱਲ' ਹੋਵੇਗੀ। ਮਾਰਕਸ ਨਿਰਾ ਪੁਰਾ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਸਗੋਂ ਹਕੀਕੀ ਵਿਦਵਾਨ ਵਿਅਕਤੀ ਸੀ। ਉਸ ਨੇ ਪੂੰਜੀ ਤੇ ਕਿਰਤ ਬਾਰੇ ਜਿੰਨੇ ਸੋਹਣੇ ਖੁਲਾਸੇ ਕੀਤੇ, ਉਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿਚ ਉੱਤਮ ਸਾਹਿਤਕ ਕਿਰਤਾਂ ਹਨ। ਨਵੇਂ ਕਾਮਰੇਡਾਂ ਨੂੰ ਕਾਮਰੇਡੀ ਮੱਤਾਂ ਦੇਣ ਵੇਲੇ ਵੀ ਜੇ ਕੋਈ ਸਾਡਾ ਸੁਹਿਰਦ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਮਿੱਤਰ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਵਾਲੀ ਮੁਹਾਰਨੀ ਹੀ ਪੜ੍ਹਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਇਹ ਉਸ ਦਾ ਵਹਿਮ ਹੈ। ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਅਸਲ ਵਿਚ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਦੀ ਸੂਖਮ ਹੱਤਿਆ ਵਾਂਗ ਹੈ।
ਜਿਵੇਂ ਵਿਚਾਰ ਦੀ ਇਕ ਹੱਦ ਤਕ ਆਪਾਂ ਸੋਚਣ ਤੇ ਕਰਨ ਲਈ ਸੁਤੰਤਰ ਹੋਈਏ ਤੇ ਕਿਸੇ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦੀ ਪੜਾਅ ਤਕ ਆ ਕੇ ਅਸੀਂ ਰੁਕ ਜਾਣਾ ਹੋਵੇ, ਕਿਉਂਜੋ 'ਸਾਡਾ ਵਾਦ' ਇਥੋਂ ਤਕ ਸੋਚਣ ਤੇ ਕਰਨ ਦੀ ਆਗਿਆ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਖ਼ਾਸਾ ਅਸਲ ਵਿਚ ਮਾਰਕਸੀ ਚਿੰਤਨ ਦਾ ਅੰਗ ਨਹੀਂ। ਸਾਡੇ ਪੁਰਾਣੇ ਅਨੁਵਾਦਕਾਂ ਦੀ ਮਜਬੂਰੀ ਸੀ ਉਹ ਲੋਕ ਕਿੰਨੇ ਵੀ ਬਾਗ਼ੀ ਰਹੇ ਹੋਣ ਕਿੰਨੇ ਵੀ ਜਾਗਰੂਕ ਰਹੇ ਹੋਣ ਅਸਲ ਵਿਚ ਜਦੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹੱਥਾਂ ਵਿਚ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦੇ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਨੂੰ ਉਲਥਾਉਣ ਦਾ ਕੰਮ ਸੌਪਿਆ ਗਿਆ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਉੱਤੇ ਸ਼ੁਰੂਆਤੀ ਪੜਾਅ ਦਾ ਮਾਰਕਸੀ ਰੁਮਾਂਸਵਾਦ ਭਾਰੂ ਸੀ। ਨਵੀਂ ਨਵੀਂ ਮਾਰਕਸੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਮਿਲੀ ਸੀ ਪਰ ਪਰਵਾਰਕ ਪਿਛੋਕੜ ਗੈਰ ਮਾਰਕਸੀ ਸੀ ਜਿਸ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਕਿਤੇ ਨਾ ਕਿਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਉੱਤੇ ਵੀ ਪਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਕੁਰਬਾਨੀਆਂ ਤੇ ਸਾਹਿਤਕ ਕਾਰਜਾਂ ਨੂੰ ਪਰਣਾਮ। ਜੇ ਕਿਤੇ ਉਸ ਦੌਰ ਦ ਅਨੁਵਾਦਕ ਪਹਿਲੀ ਸੱਟੇ ਹੀ ਮਾਰਕਸੀ ਆਡੀਆਇਜ਼ਮ ਦਾ ਉਲੱਥਾ ਮਾਰਕਸੀ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਵਜੋਂ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਤਾਂ ਅੱਜ ਨੂੰ ਮਾਰਕਸੀ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਜਿਹਾ ਲਫਜ਼ ਸਾਡੇ ਹਿਰਦੇ ਨਾ ਵਲੂੰਧਰਦਾ ਤੁਰਿਆ ਆਉਂਦਾ। ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਦਾ ਪਰਮ ਅਨੰਦ ਹੀ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਵਿਚਾਰਵਾਦੀ ਰੋਜ਼ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਬਦਲਣ ਲਈ ਤਿਆਰ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਨੂੰ ਸੱਚ ਨਾਲੋਂ ਬੰਧੇਜ ਤੇ ਵੱਖਰਤਾ ਨਾਲ ਮਤਲਬ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਭਾਰਤੀ ਕਮਿਊਨਿਸਟਾਂ ਦੀ ਨਵੀਂ ਪੀੜ੍ਹੀ ਹੁਣ ਬਹੁਤ ਸਿਆਣੀ ਹੈ ਤੇ ਨਵੀਂ ਪੀੜ੍ਹੀ ਨੂੰ ਕੋਈ ਸੇਧ ਦੇਣ ਦੀ ਬਹੁਤੀ ਲੋੜ ਵੀ ਨਹੀਂ ਪਰ ਨਵੀਂ ਪੀੜ੍ਹੀ ਵੀ ਜੇ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਨੂੰ ਡੌਗਮਾ ਹੀ ਸਮਝੀ ਰਹੀ ਤਾਂ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਦੇ ਪਰਮ ਅਨੰਦ ਤੋਂ ਵਾਂਝੀ ਰਹਿ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਤੋਂ ਵੱਧ ਕੇ ਕਿਤੇ ਕੋਈ ਮੁਕਤੀ ਨਹੀਂ। ਤੇ ਚੇਤੇ ਰਹੇ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਵੀ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਹੈ ਨਾ ਕਿ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ।
- ਵਾਹਦ ਫੀਚਰਜ਼
-ਚੋਟੀ ਦੇ ਵਿਦਵਾਨ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਕਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਇਕ ਦਿਨ ਸਟੇਟ (ਰਾਜਭਾਗ) ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿਣੀ ਤੇ ਕਮਿਊਨ ਆ ਜਾਣੈ, ਫੇਰ ਇਕ ਦਿਨ ਕਮਿਊਨ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿਣਾ ਤੇ ਇਜ਼ਮ (ਵਾਦ) ਰਹਿ ਜਾਵੇਗਾ ਤੇ ਇਕ ਦਿਨ ਵਾਦ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿਣਾ ਸਗੋਂ ਮੈਂ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਾਂਗਾ ਪਰ ਕਮਿਊਨ ਰਹਿ ਜਾਵੇਗਾ। ਇਸ ਕਮਿਊਨ ਜਾਂ ਸਮੂਹਕ ਰਹਿਣ ਸਹਿਣ ਨੂੰ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਕਮਿਊਨ ਵਜੋਂ ਪਰਭਾਸ਼ਤ ਕੀਤਾ। ਇਸੇ ਕਮਿਊਨ ਦੀ ਮੰਜ਼ਲ ਕਰ ਕੇ ਕਮਿਊਨ ਲਿਆਉਣ ਲਈ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰ ਰਹੇ ਸਿਆਸੀ ਮਿਸ਼ਨਰੀ ਨੂੰ 'ਕਮਿਊਨ ਇਸਟ' ਜਾਂ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਭਾਵ ਕਮਿਊਨ ਜਿਹਦਾ ਸਿਆਸੀ ਇਸ਼ਟ ਹੋਵੇ ਉਹ ਹੈ ਕਮਿਊਨਿਸਟ..।
ਪਰ ਸੋਚਣ ਵਾਲੀ ਗੱਲ ਤਾਂ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਜੇ ਮਾਰਕਸ ਦੀ ਸੋਚ ਵੀ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਫੇਰ ਫ਼ਲਸਫ਼ਾ ਕਿਹਨੂੰ ਕਹਾਂਗੇ? ਮਾਰਕਸ ਦਾ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਤਾਂ ਇਵੇਂ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਕਿ ਜਿਵੇਂ ਕੋਈ ਪੁਰਾਤਨ ਰਾਜੇ ਦਾ ਰਾਜਭਾਗ ਲਿਆਉਣ ਦੀ ਗੱਲ ਹੋ ਰਹੀ ਹੋਵੇ। ਅਸਲ ਵਿਚ ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਸਿਧਾਂਤ ਨਰਮ ਤੇ ਸਾਹਿਤਕ ਸ਼ਬਦਾਵਲੀ ਵਾਲੇ ਹਨ ਅਤੇ ਡੌਗਮਾ (ਜੜ੍ਹ ਵਿਚਾਰ) ਹੁੰਦੇ ਹੋਏ ਵੀ ਤਬਦੀਲੀ ਪਸੰਦ ਹਨ ਕਿ ਮਾਰਕਸ ਦਾ ਇਤਿਹਾਸਕ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਕਿਸੇ ਵੀ ਹਾਲਤ ਵਿਚ 'ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ' ਵਰਗੇ ਦਕੀਆਨੂਸੀ ਸੰਕਲਪ ਵਿਚ ਬੰਨ੍ਹਿਆ ਹੀ ਨਹੀਂ ਜਾ ਸਕਦਾ। ਜਿਵੇਂ ਇਕ ਮਿਸਾਲ ਲੈ ਲਓ ਕਿ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਨਾ ਤਾਂ ਮੀਟ, ਆਂਡੇ ਖਾਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਹੈ ਤੇ ਨਾਂ ਹੀ ਛੱਡਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਹੈ। ਨਾਂ ਤਾਂ ਕੋਈ ਰਟਣ ਮੰਤਰ ਜਪਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਹੈ ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਜਪਣ ਤੋਂ ਦੂਰ ਰਹਿਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਹੈ। ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਕੋਈ ਰਟਣ ਮੰਤਰ ਨਹੀਂ ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਭਾਈਚਾਰਕ ਵਿਖਾਵੇ ਦੀ ਕਿਰਿਆ ਸਗੋਂ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਸ਼ੁੱਧ 'ਵਿਚਾਰਵਾਦ' ਹੈ। ਵਿਚਾਰ ਤੋਂ ਭਾਵ ਥੌਟ ਵੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਵਿਚਾਰ ਦਾ ਭਾਵ ਆਈਡੀਆ ਵੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਸਮਾਜਕ ਤੇ ਆਰਥਕ ਦੁੱਖਾਂ ਦੇ ਭੰਨੇ ਬੰਦੇ ਦੇ ਮਨ ਵਿਚ ਅਨੇਕਾਂ ਸੰਸੇ, ਅਨੇਕਾਂ ਡਰ ਤੇ ਅਨੇਕਾਂ 'ਵਿਚਾਰ' ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਪਰ ਉਹ ਵਿਚਾਰ, ਅਸਲ ਵਿਚ ਚਿੰਤਾ ਤੋਂ ਉਪਜੀਆਂ ਮਾਨਸਕ ਤਰੰਗਾਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ। ਪਰ ਚਿੰਤਾ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਆਉਣਾ ਜਾਂ ਚਿੰਤਾ ਦੂਰ ਕਰਨ ਦੇ ਉਪਾਅ ਸੋਚਣੇ ਤੇ ਅਮਲ ਕਰਨਾ ਇਹ ਸਭ ਆਈਡੀਏ ਜਾਂ 'ਅਸਲੀ ਵਿਚਾਰ' ਨੂੰ ਪਰਭਾਸ਼ਤ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਜੇ ਕੋਈ ਸਾਡੀ ਪੁਰਾਤਨ ਪਸੰਦ ਭਾਰਤੀ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤੀ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਵਤ 'ਭਰਾ' ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਨੂੰ ਵੀ ਕਿਸੇ ਪੁਰਾਣੇ ਮਰਿਆਦਤ ਰਾਜੇ ਦੇ ਮਿਸਾਲੀ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਵਾਂਗ ਹੀ ਸਮਝਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਹ ਕਿਰਪਾ ਕਰਕੇ ਸਿਆਣੇ ਕਮਿਊਨਿਸਟਾਂ ਨੂੰ ਲੱਭੇ ਜਾਂ ਖੁਦ ਮਾਰਕਸ ਦੀਆਂ ਲਿਖਤਾਂ ਵਿਚੋਂ ਦੀ ਲੰਘੇ। ਭਾਰਤੀ ਕਮਿਊਸਿਨਟਾਂ ਦੀ ਕਮਿਊਨਇਜ਼ਮ ਵਾਸਤੇ ਪ੍ਰੀਬੱਧਤਾ ਘੱਟ ਨਹੀਂ ਅੰਗੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਅਸਲ ਵਿਚ ਭਾਰਤੀ ਧਰਮ ਬਾਰੇ ਮਾਓ ਨੇ ਇਕ ਵਾਰ ਟਿਪਣੀ ਕੀਤੀ ਸੀ, ਬਈ, ''ਭਾਰਤੀ ਧਰਮ ਅਸਲ ਵਿਚ ਧਰਮ ਹੀ ਨਹੀਂ ਨੇ''। ਇਸ ਤੋਂ ਪਤਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਕਿ ਚੀਨ ਵਿਚ ਚੀਨੀ ਜਨਤਾ ਦੇ ਸੁਭਾਅ, ਭੁਗੋਲਿਕ ਹਾਲਾਤ ਤੇ ਹੋਰ ਸਥਿਤੀਆਂ ਨੂੰ ਵੀਚਾਰ ਕੇ ਇਨਕਲਾਬ ਲਿਆਉਣ ਵਾਲਾ ਮਾਓ ਭਾਰਤੀ ਪੁਜਾਰੀਵਾਦ ਦੇ ਆਦਰਸ਼-ਜਾਲ ਤੋਂ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਾਣੂ ਸੀ। ਮਾਓ ਵਲੋਂ ਇੰਨਾ ਕਹਿਣਾ ਕਿ ''ਭਾਰਤੀ ਧਰਮ ਅਸਲ ਵਿਚ ਧਰਮ ਹੈ ਹੀ ਨਹੀਂ ਹਨ''। -ਇਹ ਟਿਪਣੀ ਵੱਡੀ ਵਿਆਖਿਆ ਵੱਲ ਇਸ਼ਾਰਾ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਮਾਓ ਜਾਣ ਚੁੱਕਾ ਸੀ ਕਿ ਜਿਵੇਂ ਬੁਧ ਧਰਮ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ ਨੇ ਇਸ ਫ਼ਲਸਫ਼ੇ ਨੂੰ ਟੱਲੀਆਂ ਖੜਕਾਉਣ ਤਕ ਮਹਿਦੂਦ ਕੀਤਾ ਹੋਇਆ ਹੈ ਇਵੇਂ ਹੀ ਭਾਰਤ ਦੇ ਪੁਜਾਰੀ ਤਬਕੇ ਦੀ ਹਾਲਤ ਤਾਂ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਤੋਂ ਕਿਤੇ ਮਾੜੀ ਹੈ। ਜਾਤ ਪਾਤ ਜਨਮ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਹੈ ਤੇ ਬਦਲੀ ਨੀਂ ਜਾ ਸਕਦੀ। ਬੰਦਿਆਂ ਦੇ ਕੰਮ ਤੇ ਕਿੱਤੇ ਵੀ ਤਕਰੀਬਨ ਜਨਮ ਤੋਂ ਵੰਡੇ ਹਨ ਹਾਂ ਹੁਣ ਭਾਵੇਂ ਨਵੀਂ ਚੇਤਨਾ ਮੁਜਬ ਲੋਕ ਕਿੱਤੇ ਤੇ ਸੁਭਾਅ ਬਦਲ ਰਹੇ ਹਨ ਜਿਸ ਕਰਕੇ ਜਾਤ-ਗੋਤ ਪਰਗਟ ਕਰਨ ਤੇ ਲੁਕਾਅ ਕੇ ਰੱਖਣ ਦਾ ਰੁਝਾਨ ਪਰਗਟ ਹੋਇਆ। ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੁਖੀ ਸਮਾਜਾਂ ਵਿਚ ਇਨਕਲਾਬ ਲਿਆਉਣ ਦਾ ਆਈਡੀਆ ਫੈਲਾਇਆ ਸੀ ਓਥੇ ਆਰਥਕ ਜਮਾਤਾਂ ਸਨ, ਆਹ ਜਾਤ ਵਾਲਾ ਜਨਮਜਾਤ ਪੰਗਾ ਓਥੇ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਮਾਰਕਸ ਅਸਲ ਵਿਚ ਕਮਿਊਨਇਜ਼ਮ ਦਾ ਵਿਚਾਰ 'ਦਾਤਾ' ਹੈ ਨਾ ਕਿ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦੀ ਕਥੱਕੜ। ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਤੋਂ ਤਾਂ ਇਵੇਂ ਜਾਪਦਾ ਹੈ ਕਿ ਜਿਵੇਂ ਕਿਸੇ ਫਰੇਮ ਵਿਚ ਬੱਝ ਕੇ ਬੰਦੇ ਨੇ ਕੰਮ ਕਰਨਾ ਹੈ ਤੇ ਉਸ ਦੀ ਯੂਨੀਫਾਰਮ, ਉਸ ਦੀ ਸ਼ਬਦਾਵਲੀ ਉਸ ਨੇ ਕਿਵੇਂ ਉਠਣਾ ਬੈਠਣਾ ਹੈ, ਬਾਰੇ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਕੋਈ ਆਦਰਸ਼ ਮਿੱਥ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਪਰ ਸੱਚਾਈ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਬੰਦੇ ਨੂੰ ਸਹਿਜ ਹੋਣ ਵੱਲ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਮਾਰਕਸੀ ਕਾਰਕੁੰਨ ਦੀ ਕੋਈ ਪੱਕੀ ਯੂਨੀਫਾਰਮ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ ਤੇ ਨਾਂ ਹੀ ਉਸ ਨੇ ਕੀ ਖਾਣਾ ਹੈ ਤੇ ਕੀ ਨਹੀਂ ਖਾਣਾ ਹੈ? ਕਿਹੜੇ ਮੰਤਰ ਦਾ ਰੱਟਾ ਲਾਉਣਾ ਹੈ, ਆਦਿ ਦਾ ਕੋਈ ਬੰਧੇਜ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦੇ ਸਿਆਸੀ ਲੀਡਰਾਂ ਨਾਲੋਂ ਇਸ ਵਾਦ ਬਾਰੇ ਮਾਰਕਸੀ ਨਜ਼ਰੀਏ ਤੋਂ ਕਹਾਣੀਆਂ ਲਿਖਣ ਵਾਲੇ ਤੇ ਮਾਰਕਸੀ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਮੁਤਾਬਕ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਲਿਖਣ ਵਾਲੇ ਵੱਧ ਜਾਣਦੇ ਹਨ। ਕਿਉਂਕਿ ਲੇਖਕ ਤੇ ਕਵੀ ਹਮੇਸ਼ਾ ਦਿਲ ਦੀ ਦੁਨੀਆਂ ਵਿਚ ਜੀਉਂਦੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਤੇ ਬਾਕੀ ਸਮਾਜ ਹਨੇਰੇ ਵਿਚ। ਚੁਸਤ ਲੀਡਰ ਲੋਕ ਜੁਗਾੜੀ ਸ਼੍ਰੇਣੀ ਵਿਚ ਆਉਂਦੇ ਹਨ। ਲੀਡਰਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਦਰਅਸਲ, ਵਿਚਾਰਵਾਦੀ ਕਵੀਆਂ ਤੇ ਲੇਖਕਾਂ ਦੀਆਂ ਲਿਖਤਾਂ ਨੇ ਹੀ 'ਤਿਆਰ' ਕੀਤਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਇਕ ਬੜੀ ਭੈੜੀ ਗੱਲ ਰੋਜ਼ ਵਾਪਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਜਦੋਂ ਵੀ ਕੋਈ ਬੰਦਾ ਬਿਜਲੀ ਦਾ ਬਿਲ ਜਮ੍ਹਾ ਕਰਾਉਣ ਚਲਾ ਜਾਵੇ ਜਾਂ ਕਿਸੇ ਸਰਕਾਰੀ ਮਹਿਕਮੇ ਵਿਚ ਚਲਾ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਉਥੇ ਕੁਝ ਨਾਅਰੇਬਾਜ਼ ਸੱਜਣ ਦਰੀ ਵਿਛਾਅ ਕੇ ਨਾਅਰੇਬਾਜ਼ੀ ਕਰਦੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਤੇ ਕੁਝ ਸੱਜਣ ਜ਼ਿੰਦਾਬਾਦ ਕਰਦੇ ਕੰਨੀਂ ਪੈਂਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਲੋਕ ਕਹਿਣ ਕਹਾਉਣ ਨੂੰ ਕਾਮਰੇਡ ਹੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਜਦਕਿ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦੇ ਟੀਚੇ ਕਮਿਊਨਇਜ਼ਮ ਨਾਲੋਂ ਇਸ ਤਬਕੇ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਤਨਖਾਹ ਵਧਾਉਣ ਤੇ ਭੱਤੇ ਵੱਧ ਲੈਣ ਤਕ ਗਰਜ਼ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਨੂੰ ਸਮਝਣ ਦੀ ਵੱਡੀ ਯੋਗਤਾ ਵਿਦਵਤਾ ਹੈ ਜੇ ਕੋਈ ਸੱਜਣ ਕਹੇ ਕਿ ਉਹ ਵਿਦਵਤਾ ਤਿੱਖੀ ਕੀਤੇ ਬਗੈਰ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦੇ ਸ਼ਾਨਾਮੱਤੇ ਪਹਿਲੂ ਤੇ ਲੁਟੇਰੇ ਤਬਕਿਆਂ ਦੇ ਲੀਚੜ ਕਿਰਦਾਰ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇਗਾ ਤਾਂ ਇਹ ਉਸ ਦੀ 'ਆਦਰਸ਼ਵਾਦੀ ਬਚਕਾਨਾ ਭੁੱਲ' ਹੋਵੇਗੀ। ਮਾਰਕਸ ਨਿਰਾ ਪੁਰਾ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਸਗੋਂ ਹਕੀਕੀ ਵਿਦਵਾਨ ਵਿਅਕਤੀ ਸੀ। ਉਸ ਨੇ ਪੂੰਜੀ ਤੇ ਕਿਰਤ ਬਾਰੇ ਜਿੰਨੇ ਸੋਹਣੇ ਖੁਲਾਸੇ ਕੀਤੇ, ਉਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿਚ ਉੱਤਮ ਸਾਹਿਤਕ ਕਿਰਤਾਂ ਹਨ। ਨਵੇਂ ਕਾਮਰੇਡਾਂ ਨੂੰ ਕਾਮਰੇਡੀ ਮੱਤਾਂ ਦੇਣ ਵੇਲੇ ਵੀ ਜੇ ਕੋਈ ਸਾਡਾ ਸੁਹਿਰਦ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਮਿੱਤਰ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਵਾਲੀ ਮੁਹਾਰਨੀ ਹੀ ਪੜ੍ਹਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਇਹ ਉਸ ਦਾ ਵਹਿਮ ਹੈ। ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਅਸਲ ਵਿਚ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਦੀ ਸੂਖਮ ਹੱਤਿਆ ਵਾਂਗ ਹੈ।
ਜਿਵੇਂ ਵਿਚਾਰ ਦੀ ਇਕ ਹੱਦ ਤਕ ਆਪਾਂ ਸੋਚਣ ਤੇ ਕਰਨ ਲਈ ਸੁਤੰਤਰ ਹੋਈਏ ਤੇ ਕਿਸੇ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦੀ ਪੜਾਅ ਤਕ ਆ ਕੇ ਅਸੀਂ ਰੁਕ ਜਾਣਾ ਹੋਵੇ, ਕਿਉਂਜੋ 'ਸਾਡਾ ਵਾਦ' ਇਥੋਂ ਤਕ ਸੋਚਣ ਤੇ ਕਰਨ ਦੀ ਆਗਿਆ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਖ਼ਾਸਾ ਅਸਲ ਵਿਚ ਮਾਰਕਸੀ ਚਿੰਤਨ ਦਾ ਅੰਗ ਨਹੀਂ। ਸਾਡੇ ਪੁਰਾਣੇ ਅਨੁਵਾਦਕਾਂ ਦੀ ਮਜਬੂਰੀ ਸੀ ਉਹ ਲੋਕ ਕਿੰਨੇ ਵੀ ਬਾਗ਼ੀ ਰਹੇ ਹੋਣ ਕਿੰਨੇ ਵੀ ਜਾਗਰੂਕ ਰਹੇ ਹੋਣ ਅਸਲ ਵਿਚ ਜਦੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹੱਥਾਂ ਵਿਚ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦੇ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਨੂੰ ਉਲਥਾਉਣ ਦਾ ਕੰਮ ਸੌਪਿਆ ਗਿਆ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਉੱਤੇ ਸ਼ੁਰੂਆਤੀ ਪੜਾਅ ਦਾ ਮਾਰਕਸੀ ਰੁਮਾਂਸਵਾਦ ਭਾਰੂ ਸੀ। ਨਵੀਂ ਨਵੀਂ ਮਾਰਕਸੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਮਿਲੀ ਸੀ ਪਰ ਪਰਵਾਰਕ ਪਿਛੋਕੜ ਗੈਰ ਮਾਰਕਸੀ ਸੀ ਜਿਸ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਕਿਤੇ ਨਾ ਕਿਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਉੱਤੇ ਵੀ ਪਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਕੁਰਬਾਨੀਆਂ ਤੇ ਸਾਹਿਤਕ ਕਾਰਜਾਂ ਨੂੰ ਪਰਣਾਮ। ਜੇ ਕਿਤੇ ਉਸ ਦੌਰ ਦ ਅਨੁਵਾਦਕ ਪਹਿਲੀ ਸੱਟੇ ਹੀ ਮਾਰਕਸੀ ਆਡੀਆਇਜ਼ਮ ਦਾ ਉਲੱਥਾ ਮਾਰਕਸੀ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਵਜੋਂ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਤਾਂ ਅੱਜ ਨੂੰ ਮਾਰਕਸੀ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਜਿਹਾ ਲਫਜ਼ ਸਾਡੇ ਹਿਰਦੇ ਨਾ ਵਲੂੰਧਰਦਾ ਤੁਰਿਆ ਆਉਂਦਾ। ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਦਾ ਪਰਮ ਅਨੰਦ ਹੀ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਵਿਚਾਰਵਾਦੀ ਰੋਜ਼ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਬਦਲਣ ਲਈ ਤਿਆਰ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ ਨੂੰ ਸੱਚ ਨਾਲੋਂ ਬੰਧੇਜ ਤੇ ਵੱਖਰਤਾ ਨਾਲ ਮਤਲਬ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਭਾਰਤੀ ਕਮਿਊਨਿਸਟਾਂ ਦੀ ਨਵੀਂ ਪੀੜ੍ਹੀ ਹੁਣ ਬਹੁਤ ਸਿਆਣੀ ਹੈ ਤੇ ਨਵੀਂ ਪੀੜ੍ਹੀ ਨੂੰ ਕੋਈ ਸੇਧ ਦੇਣ ਦੀ ਬਹੁਤੀ ਲੋੜ ਵੀ ਨਹੀਂ ਪਰ ਨਵੀਂ ਪੀੜ੍ਹੀ ਵੀ ਜੇ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਨੂੰ ਡੌਗਮਾ ਹੀ ਸਮਝੀ ਰਹੀ ਤਾਂ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਦੇ ਪਰਮ ਅਨੰਦ ਤੋਂ ਵਾਂਝੀ ਰਹਿ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਤੋਂ ਵੱਧ ਕੇ ਕਿਤੇ ਕੋਈ ਮੁਕਤੀ ਨਹੀਂ। ਤੇ ਚੇਤੇ ਰਹੇ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਵੀ ਵਿਚਾਰਵਾਦ ਹੈ ਨਾ ਕਿ ਆਦਰਸ਼ਵਾਦ।
- ਵਾਹਦ ਫੀਚਰਜ਼
Sunday, 25 December 2011
ਇਨਾਮ ਮਿਲਣ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ : ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ 'ਸੜਕਨਾਮਾ'

ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ 'ਸੜਕਨਾਮਾ' ਨੇ ਇਤਿਹਾਸਕ ਨਾਇਕ ਦੁੱਲਾ ਭੱਟੀ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਨਾਵਲ ਜ਼ਰੀਏ ਲੋਕ-ਮਨਾਂ ਵਿਚ ਸੁਰਜੀਤ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਜਿਸ ਸਦਕਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਭਾਰਤੀ ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਵਲੋਂ ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਪੁਰਸਕਾਰ 14 ਫਰਵਰੀ ਨੂੰ ਦਿੱਲੀ ਵਿਖੇ ਦਿੱਤਾ ਜਾਵੇਗਾ। ਜਿਸ ਵਿਚ 1 ਲੱਖ ਰੁਪਏ ਦੀ ਰਕਮ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਇਕ ਸ਼ਾਲ ਤੇ ਇਕ ਯਾਦਗਾਰੀ ਚਿਨ੍ਹ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ। ਯਾਦ ਰਹੇ ਇਹ ਇਨਾਮ ਸਾਰੇ ਭਾਰਤ ਵਿਚ ਹਰੇਕ ਬੋਲੀ ਦੇ ਇਕ ਲਿਖਾਰੀ ਨੂੰ ਹੀ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਜੋ ਇਸ ਵਾਰ ਭਾਰਤ ਦੇ ਵੱਖ ਵੱਖ ਬੋਲੀਆਂ ਦੇ 22 ਲਿਖਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਦਿੱਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਇਹ ਭਾਰਤ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਸਾਹਿਤਕ ਪੁਰਸਕਾਰ ਹੈ। ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਇਹ ਪੁਰਸਕਾਰ ਜਸਵੰਤ ਸਿੰਘ ਕੰਵਲ ਦੇ ਨਾਵਲ ਤੌਸ਼ਾਲੀ ਦੀ ਹੰਸੋ, ਗੁਰਦਿਆਲ ਸਿੰਘ ਦੇ ਨਾਵਲ ਮੜੀ ਦਾ ਦੀਵਾ ਅਤੇ ਰਾਮ ਸਰੂਪ ਦੇ ਅਣਖੀ ਦੇ ਨਾਵਲ ਕੋਠੇ ਖੜਕ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਵੀ ਮਿਲ ਚੁੱਕਾ ਹੈ। ਕੁਝ ਪਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਬੈਠਣ ਦਾ ਮੌਕਾ ਮਿਲਿਆ। ਇਕ ਨਿੱਕੀ ਜਿਹੀ ਮੁਲਾਕਾਤ ਦੀ ਗੱਲਬਾਤ ਇਵੇਂ ਹੈ—
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? ਬਲਦੇਵ ਸਿੰਘ ਜੀ, ਮੁਢਲੇ ਜੀਵਨ ਤੇ ਸਾਹਿਤਕ ਸਫਰ ਬਾਰੇ ਦੱਸੋ।
- ਮੇਰਾ ਸਾਹਿਤਕ ਜੀਵਨ ਅਸਲ ਵਿਚ 1976-77 ਵਿਚ ਸ਼ੁਰੂ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਪਰ ਮੈਂ ਕਦੇ ਸੋਚਿਆ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਿ ਮੈਂ ਇਸ ਖੇਤਰ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਸਮਰਪਤ ਹੋ ਜਾਵਾਗਾਂ। ਕਲਕੱਤਾ ਵਿਚ ਮੈਂ ਟ੍ਰਾਂਸਪੋਰਟ ਕਿੱਤੇ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਰਿਹਾਂ, ਡਰਾਈਵਰ ਤਬਕੇ ਦੇ ਦੁੱਖਾਂ ਦਰਦਾਂ ਨੂੰ ਮੈਂ ਨੇੜਿਓਂ ਵੇਖਿਆ ਤੇ ਹੰਢਾਇਆ ਹੈ। ਉਹਨਾਂ ਬਾਰੇ 'ਸੜਕਨਾਮਾ' ਕਾਲਮ ਵਿਚ ਮੈਂ ਜੋ ਲਿਖਿਆ ਨੂੰ ਅਮ੍ਰਿਤਾ ਪ੍ਰੀਤਮ ਨੇ ਆਪਣੇ ਰਸਾਲੇ 'ਨਾਗਮਣੀ' ਵਿਚ ਲਗਾਤਾਰ 20 ਸਾਲ ਛਾਪਿਆ। ਇਹ ਕਾਲਮ ਏਨਾਂ ਮਕਬੂਲ ਹੋਇਆ ਕਿ ਸੜਕਨਾਮਾ ਮੇਰੀ ਪਛਾਣ ਬਣ ਗਿਆ। ਇਸ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਮੇਰਾ ਰੁਝਾਨ ਕਹਾਣੀਆਂ, ਨਾਵਲਾਂ ਤੇ ਨਾਟਕ ਲਿਖਣ ਵੱਲ ਹੋ ਗਿਆ। ਕਲਕੱਤਾ ਰਹਿੰਦੇ ਹੋਏ 1985 ਤੱਕ ਮੇਰੇ ਤਿੰਨ ਕਹਾਣੀ ਸੰਗ੍ਰਹਿ, ਤਿੰਨ ਨਾਵਲ ਤੇ ਸੜਕਨਾਮਾ ਛੱਪ ਚੁੱਕੇ ਸਨ। ਮੇਰਾ ਪਿਛੋਕੜ ਨਿਰੋਲ ਪੇਂਡੂ ਹੈ। ਮੋਗਾ ਦੇ ਲਾਗਲੇ ਪਿੰਡ ਚੰਦ ਨਵਾਂ ਵਿਖੇ ਮੇਰਾ ਜਨਮ 1942 ਵਿਚ ਸਧਾਰਨ ਕਿਸਾਨ ਹਰਦਿਆਲ ਸਿੰਘ ਦੇ ਘਰ ਹੋਇਆ। ਚੰਦ ਨਵਾਂ ਤੋਂ ਦਸਵੀਂ ਕਰਕੇ ਮੈਂ 1962 ਵਿਚ ਮੋਗਾ ਦੇ ਡੀ. ਐਮ. ਕਾਲਜ ਤੋਂ ਬੀ. ਏ. ਕੀਤੀ ਤੇ 1963 ਵਿਚ ਡੀ. ਐਮ. ਕਾਲਜ ਆਫ ਐਜੂਕੇਸ਼ਨ ਤੋਂ ਬੀ. ਐੱਡ ਕੀਤੀ। ਤਿੰਨ ਸਾਲ ਪੰਜਾਬ ਵਿਚ ਅਤੇ ਤਿੰਨ ਸਾਲ ਹਿਮਾਚਲ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਸਰਕਾਰੀ ਅਧਿਆਪਕ ਰਿਹਾ। ਸਰਕਾਰੀ ਅਧਿਆਪਕੀ ਰਾਸ ਨਾ ਆਉਣ ਕਾਰਨ ਮੈਂ ਕਲਕੱਤਾ ਚਲੇ ਗਿਆ ਤੇ ਟ੍ਰਾਂਸਪੋਰਟ ਦੇ ਧੰਦੇ ਵਿਚ ਪੈ ਗਿਆ ਤੇ ਨਾਲ ਦੀ ਨਾਲ ਹੀ ਟ੍ਰਾਂਸਪੋਰਟ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਡਰਾਈਵਰਾਂ, ਖਲਾਸੀਆਂ, ਸੜਕਾਂ ਤੇ ਢਾਬਿਆਂ ਬਾਰੇ ਨਿੱਜੀ ਤਜਰਬਿਆਂ ਨੂੰ ਕਲਮਬੱਧ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ।
ਹੁਣ ਤੱਕ ਕਿੰਨਾਂ ਕੁਝ ਲਿਖ ਚੁੱਕੇ ਹੋ?
-ਹੁਣ ਤੱਕ ਮੈਂ 50 ਤੋਂ ਵੱਧ ਪੁਸਤਕਾਂ ਲਿਖ ਚੁੱਕਾਂ ਹਾਂ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ਕਹਾਣੀਆਂ, ਨਾਵਲ, ਨਾਟਕ, ਬਾਲ ਸਾਹਿਤ ਤੇ ਸਫਰਨਾਮਾ ਆਦਿ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ। ਮੇਰੇ ਨਾਵਲ ਲਾਲ ਬੱਤੀ, ਅੰਨ੍ਹ ਦਾਤਾ, ਪੰਜਵਾਂ ਸਾਹਿਜ਼ਜਾਦਾ, ਸਤਲੁਜ ਵਹਿੰਦਾ ਰਿਹਾ ਤੇ ਮਹਾਬਲੀ ਸੂਰਮਾ ਆਦਿ ਬਹੁਤ ਚਰਚਿਤ ਨਾਵਲ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਹ ਨਾਵਲ 'ਢਾਵਾਂ ਦਿੱਲੀ ਦੇ ਕਿੰਗਰੇ' ਦੁੱਲਾ ਭੱਟੀ ਦੇ ਜੀਵਨ ਦਾ ਨਾਵਲੀਕਰਣ ਹੈ, ਜੀਹਨੇ ਅਕਬਰ ਵਰਗੇ ਤਾਕਤਵਰ ਸ਼ਹਿਨਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਵੰਗਾਰਿਆ ਤੇ ਸ਼ਹਿਨਸ਼ਾਹ ਦੇ ਜ਼ੁਲਮਾਂ ਤੋਂ ਤੰਗ ਆਏ ਕਿਸਾਨਾਂ ਤੇ ਹੋਰਨਾਂ ਵਿਦਰੋਹੀਆਂ ਨੂੰ ਲਾਮਬੱਧ ਕਰ ਕੇ ਉਹਨਾਂ ਵਿਚ ਸ਼ਾਹੀ ਫੌਜਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਡਟਣ ਦੀ ਜੁਅਰਤ ਪੈਦਾ ਕੀਤੀ। ਮੇਰੇ ਇਸ ਨਾਵਲ ਨੂੰ ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਵਲੋਂ ਇਨਾਮ ਮਿਲਣ ਤੇ ਇਹ ਸਾਬਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਮੇਰੇ ਇਤਿਹਾਸਕ ਨਾਵਲ ਨੂੰ ਮਾਨਤਾ ਮਿਲੀ ਹੈ। ਪਹਿਲਾਂ ਮਿਲੇ ਮਾਣ ਸਨਮਾਨਾਂ ਬਾਰੇ ਦੱਸੋ?
-ਇਹ ਇਨਾਮ ਮਿਲਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਅਨੇਕਾਂ ਸਾਹਿਤਕ ਸਭਾਵਾਂ ਤੇ ਸੰਸਥਾਵਾਂ ਵਲੋਂ ਵਲੋਂ ਮੈਨੂੰ ਮੈਕਸਿਮ ਗੋਰਕੀ ਅਵਾਰਡ, ਕਥਾ ਅਵਾਰਡ ਦਿੱਲੀ, ਨਾਗਮਣੀ ਅਵਾਰਡ, ਕਰਤਾਰ ਸਿੰਘ ਧਾਲੀਵਾਲ ਯਾਦਗਾਰੀ ਪੁਰਸਕਾਰ, ਕੇਵਲ ਵਿੱਗ ਅਵਾਰਡ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਇਲਾਕੇ ਦੀਆਂ ਸਮਾਜਕ, ਧਾਰਮਕ ਤੇ ਰਾਜਨੀਤਕ ਅਦਾਰਿਆ ਵਲੋਂ ਅਨੇਕਾਂ ਵਾਰ ਸਨਮਾਨਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹਾਂ। ਇਹ ਫਹਿਰਿਸਤ ਬਹੁਤ ਲੰਬੀ ਹੈ। ਪਰ ਅੱਜ ਮੇਰੇ ਲਈ ਭਾਰਤੀ ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਦੇ ਅਵਾਰਡ ਨਾਲੋਂ ਲੋਕਾਂ ਅਤੇ ਪਾਠਕਾਂ ਵਲੋਂ ਮਿਲੇ ਮਾਣ ਸਨਮਾਨ ਜਿਆਦਾ ਅਹਿਮੀਅਤ ਰੱਖਦੇ ਨੇ।
? ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਦਾ ਇਨਾਮ ਮਿਲਣ ਤੇ ਤੁਸੀਂ ਕੀ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦੇ ਹੋ।
-ਮੈਂ ਸਮਝਦਾਂ ਕਿ ਸਨਮਾਨ ਲੈਣ ਦੀ ਇਕ ਰੁੱਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਜਿਹੜੀ ਕਿ 8-10 ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਲੰਘ ਗਈ ਪ੍ਰਤੀਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਫੇਰ ਵੀ ਇਹ ਸਨਮਾਨ ਮਿਲਣ ਤੇ ਮੈਂ ਜਿਹੜੇ ਵਿਦਵਾਨ ਇਸ ਚੋਣ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਹਨ, ਦਾ ਧੰਨਵਾਦੀ ਹਾਂ ਕਿ ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਮੇਰੀ 35 ਸਾਲ ਦੀ ਸਾਹਿਤਕ ਘਾਲਣਾ ਨੂੰ ਮਹਿਸੂਸ ਕੀਤਾ ਹੈ ਤੇ ਮੇਰੇ ਇਤਿਹਾਸਕ ਨਾਵਲਾਂ ਨੂੰ ਮਾਨਤਾ ਦਿੱਤੀ ਹੈ। ਮੈਨੂੰ ਇਹ ਪੁਰਸਕਾਰ ਮਿਲਣ ਤੇ ਅਸੀਮ ਖੁਸ਼ੀ ਹੈ ਤੇ ਖੁਸ਼ੀ ਹੋਣੀ ਵੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ।
_ਅਮਰਜੀਤ ਬੱਬਰੀ
Saturday, 24 December 2011
ਸਾਹਿਤਕ ਧਾਰਾ
'ਸਾਹਿਤਕ ਧਾਰਾ' ਵੈੱਬ ਪੋਰਟਲ 'ਤੇ
ਪੜ੍ਹੋ : ਸਾਹਿਤ ਦੇ ਸਾਰੇ ਰੂਪ, ਵਿਚਾਰਧਾਰਕ
ਲਿਖਤਾਂ। ਆਪਣੀ ਕਿਰਤ ਨੂੰ 'ਸਾਹਿਤਕ ਧਾਰਾ'
'ਤੇ ਵੇਖਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ ਤਾਂ ਈ. ਮੇਲ ਕਰ ਦਿਓ।
ਸੁਝਾਆਂ ਤੇ ਪੁੱਛਗਿੱਛ ਦਾ ਸੁਆਗਤ।
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